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चंद्र शेखर मायावती अखिलेश आये साथ ! योगी को घेरने की कर ली पूरी तैयारी !

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मेरठ के सरधना क्षेत्र का कपसाड़ गांव।एक दलित महिला की हत्या। एक बेटी का सरेआम अपहरण। और उसके बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसा उबाल, जैसे किसी को बैठे-बिठाए सबसे बड़ा मुद्दा मिल गया हो।

जो मामला कानून, जांच और इंसाफ का होना चाहिए था, वह देखते-देखते जाति, वोट बैंक और 2027 की चुनावी रणनीति का अखाड़ा बन गया। योगी आदित्यनाथ सीधे कटघरे में खड़े कर दिए गए। विपक्ष के तमाम नेता गरजने लगे “अगर यूपी में महिलाएं सुरक्षित हैं तो यह क्या है?” पहली नजर में तस्वीर डराने वाली है। लगता है कि सरकार पूरी तरह फेल है, पुलिस नाकाम है और कानून व्यवस्था सवालों के घेरे में है। लेकिन जैसे ही इस पूरे मामले की परतें खुलती हैं, कहानी उतनी सीधी नहीं रह जाती, जितनी मंचों और कैमरों के सामने दिखाई जा रही है। घटना के बाद जिस तेजी से राजनीतिक नेताओं की एंट्री हुई, उसने सवाल खड़े कर दिए।

चंद्रशेखर आज़ाद रावण बैरिकेटिंग तोड़कर, भारी पुलिस बल के बीच बाइक से पीड़ित परिवार तक पहुंचे। इस दौरान उनके तेवर, उनके बयान और “मैं कोई मामूली इंसान नहीं हूं” जैसी चेतावनियां दलित पीड़ा से ज्यादा सत्ता को सीधी चुनौती देने जैसी लगीं। हजारों पुलिसकर्मी, नारे, अफरातफरी और “यह जुल्म नहीं सहेंगे” जैसे नारों के बीच माहौल ऐसा बनाया गया मानो पूरा पश्चिमी उत्तर प्रदेश जलने को तैयार हो। मायावती ने करारा हमला बोला, अखिलेश यादव ने सरकार पर दलित उत्पीड़न का आरोप लगाया, कांग्रेस भी पीछे नहीं रही। सवाल यह है कि क्या यह सब न्याय के लिए था, या चुनावी जमीन तैयार करने की कवायद? राजनीतिक शोर से अलग अगर तथ्यों पर नजर डालें तो तस्वीर थोड़ी बदलती है।

पुलिस ने कुछ ही घंटों में आरोपी पारस राजपूत को गिरफ्तार कर लिया। अपहृत लड़की को सकुशल बरामद कर लिया गया। मेरठ और सहारनपुर पुलिस ने संयुक्त ऑपरेशन चलाया। एसपी विपिन टाडा खुद पीड़ित परिवार से मिले। सुरक्षा, सरकारी सहायता और सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया गया। प्रशासन ने साफ कहा कि जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी और जो भी माहौल बिगाड़ने की कोशिश करेगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा। यही वह बिंदु है, जिसे सियासी शोर में दबाने की कोशिश हुई।

गांव की गवाही: कहानी का दूसरा चेहरा जब इस पूरे मामले को गांव वालों की नजर से देखा गया, तो कहानी ने नया मोड़ ले लिया। ग्रामीणों का दावा है कि यह मामला अचानक हुआ कोई जातीय अपराध नहीं, बल्कि ढाई साल पुराने प्रेम प्रसंग से जुड़ा हुआ है। ग्रामीण सुधीर के मुताबिक लड़का और लड़की के बीच लंबे समय से संबंध थे। गांव में पंचायत हुई थी। शादी और समझौते की बात भी चली थी। यहां तक कि पैसे देने और शादी कराने का प्रस्ताव भी रखा गया था, लेकिन दोनों पक्षों की सहमति नहीं बनी। ग्रामीणों ने यह भी दावा किया कि लड़का नाबालिग है, जिसकी उम्र 15–16 साल के आसपास है, जबकि लड़की करीब 23 साल की है। ग्रामीणों का कहना है कि दोनों अपनी मर्जी से फरार हुए थे और पूरे मामले को बाद में सियासी रंग दिया गया। ये दावे जांच का विषय हैं, लेकिन यह सवाल जरूर खड़ा करते हैं कि क्या पूरी सच्चाई सामने रखी गई?


जैसे ही आरोपी का नाम “पारस राजपूत” सामने आया, पूरा मामला ठाकुर बनाम दलित के फ्रेम में फिट कर दिया गया। विपक्ष को मानो तैयार स्क्रिप्ट मिल गई। यहां एक सवाल उठता है—इटावा की घटना क्यों याद नहीं आती? जहां दलित परिवार की भागवत कथा रोकी गई, अंबेडकर की मूर्ति तोड़ी गई, लोग घायल हुए और आरोपी यादव समाज से थे। उस वक्त न सड़कें जाम हुईं, न बड़े नेता पहुंचे, न ऐसा राजनीतिक तूफान उठा। तो क्या विरोध भी जाति देखकर होता है? इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ होती है—2027 का विधानसभा चुनाव अब दूर नहीं है। हर बड़ी घटना को दलित-ओबीसी समीकरण में बदलने की कोशिश हो रही है।

योगी आदित्यनाथ को “ठाकुरवादी” साबित करने की रणनीति, बुलडोजर को जाति से जोड़ने का प्रयास, सब उसी राजनीतिक स्क्रिप्ट का हिस्सा है। जबकि उत्तर प्रदेश यह देख चुका है कि योगी सरकार का बुलडोजर न जाति देखता है, न धर्म—वह सिर्फ अपराध देखता है। अब इस पूरी खबर का निष्कर्ष क्या है तो वो भी आप जान लीजिये ,,एक मां की मौत और एक बेटी का अपहरण किसी भी समाज के लिए गहरा जख्म है। पीड़ित परिवार का दर्द असली है और उन्हें न्याय मिलना चाहिए—इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन उस दर्द को सियासी हथियार बनाना, भीड़ भड़काना और जातिगत जहर घोलना न्याय नहीं, चुनावी सौदेबाज़ी है।जांच जारी है। लड़की का बयान होगा। सच सामने आएगा।तब तक सवाल यही है—क्या हम अपराध से लड़ना चाहते हैं, या हर घटना को चुनावी अखाड़ा बनाकर समाज को बांटना चाहते हैं?

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