80 के दशक का उत्तर प्रदेश… जब कानून की सीमाएं अक्सर अपराधियों के सामने कमजोर पड़ जाती थीं, उसी दौर में एक नाम तेजी से उभरने लगा था, पेट्रोल पंप और ट्रक कारोबार से जुड़ा एक साधारण सा चेहरा, लेकिन उसके पीछे छुपा था ऐसा डर और दबदबा कि पुलिस भी सतर्क रहती थी, यह सिर्फ शुरुआत थी अपराध की दुनिया में अपनी पकड़ मजबूत करने के बाद उसने सत्ता का रास्ता चुना, कहा जाता है कि दिग्गज कांग्रेसी नेता कमलापति त्रिपाठी ने उसे राजनीति की दिशा दिखाई और फिर सफर ब्लॉक प्रमुख से लेकर समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता मुलायम सिंह यादव के करीबी तक जा पहुंचा।
जेल की सलाखें भी उसके राजनीतिक प्रभाव को रोक नहीं सकीं, लेकिन योगी सरकार के दौर में वही बाहुबली अब लंबे समय से सलाखों के पीछे है, हम बात कर रहे हैं ज्ञानपुर विधानसभा सीट की, जहां लंबे समय तक यह कहा जाता रहा कि पूरी राजनीति बाहुबली विजय मिश्रा के इर्द-गिर्द घूमती है।

पुलिस की फाइलों में ‘डी–12 गैंग’
भदोही पुलिस के रिकॉर्ड के मुताबिक, पूर्व विधायक विजय मिश्रा का गैंग ‘डी–12’ एक संगठित आपराधिक नेटवर्क था, जिसका नेतृत्व स्वयं विजय मिश्रा कर रहे थे, पुलिस के अनुसार, उनके बेटे, भतीजे और कई करीबी सहयोगियों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत मुकदमे दर्ज हुए, इसके बाद कार्रवाई करते हुए करोड़ों रुपये की चल-अचल संपत्तियां कुर्क की गईं, हाल ही में 1 करोड़ 28 लाख रुपये से अधिक की रकम जब्त की गई।
प्रयागराज के एक साधारण परिवार से निकला यह नाम, भदोही में वसूली, डर और जातीय पकड़ के सहारे धीरे-धीरे पूरे पूर्वांचल की सियासत तक पहुंच गया, हरिशंकर तिवारी के बाद पूर्वांचल में ब्राह्मण बाहुबली की जो जगह खाली हुई थी, उसे विजय मिश्रा ने रणनीति के तहत भरा और राजनीति में तेजी से उभरे।
रेप केस और सजा
लेकिन सत्ता के केंद्र में रहा यही बाहुबली आज एक गंभीर अपराध में दोषी करार दिया जा चुका है, साल 2020 में एक महिला गायिका ने आरोप लगाया कि 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान प्रचार के बहाने बुलाकर उसके साथ हथियारों के बल पर रेप किया गया, पीड़िता के अनुसार, इसके बाद उसे लगातार ब्लैकमेल भी किया गया।
यह मामला भदोही के गोपीगंज थाने में आईपीसी की धारा 376डी, 342 और 506 के तहत दर्ज हुआ, लंबी सुनवाई के बाद एमपी-एमएलए कोर्ट ने विजय मिश्रा को दोषी ठहराते हुए 15 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई हालांकि, सबूतों के अभाव में उनके बेटे और पोते को बरी कर दिया गया।
ज्ञानपुर सीट का सियासी इतिहास
ज्ञानपुर विधानसभा सीट का गठन 1962 में हुआ था, यहां कांग्रेस, बीजेपी और अलग-अलग गठबंधन आते-जाते रहे, लेकिन 2002 से 2017 तक विजय मिश्रा लगातार चार बार विधायक चुने गए। खास बात यह रही कि 2012 में वे जेल में रहते हुए भी चुनाव जीतने में सफल रहे।
हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर बदली, विजय मिश्रा तीसरे स्थान पर खिसक गए और निषाद पार्टी के प्रत्याशी विपुल दुबे ने जीत दर्ज की, इसे कई लोग ज्ञानपुर की राजनीति में एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखते हैं।
जातीय समीकरण और सियासी रणनीति
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि भदोही के ब्राह्मण बहुल सामाजिक ढांचे को विजय मिश्रा ने अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया, हरिशंकर तिवारी के बाद पूर्वांचल में खाली हुए ब्राह्मण माफिया स्पेस को उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से भरा। ब्राह्मण कनेक्शन, धार्मिक छवि, यज्ञ, व्रत और भव्य पूजाएं सब कुछ उनकी सियासी रणनीति का हिस्सा रहा।
अब सवाल 2027 के विधानसभा चुनाव का है, क्या ज्ञानपुर की जनता अतीत की उस बाहुबली राजनीति को पूरी तरह पीछे छोड़ चुकी है? या फिर बाहुबल की परछाईं आज भी वोटिंग व्यवहार को प्रभावित करती है? क्या ब्राह्मण वोट बैंक किसी नए नेतृत्व की तलाश में है? और सबसे अहम क्या निर्णायक माने जाने वाले बिंद मतदाता इस बार सत्ता की दिशा बदलने में बड़ी भूमिका निभाएंगे?
इन सवालों के जवाब आने वाला वक्त और 2027 का चुनाव ही देगा, लेकिन इतना तय है कि ज्ञानपुर की राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी है।





