उत्तर प्रदेश की राजनीति इस वक्त किसी शांत नदी की तरह नहीं, बल्कि उफनते लावे की तरह बह रही है। हर दिन हालात बदल रहे हैं, हर घंटे नए संकेत मिल रहे हैं और हर मुलाकात एक नई कहानी कह रही है। सत्ता के गलियारों में अब यह चर्चा नहीं है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ क्या फैसला लेने जा रहे हैं, बल्कि असली सवाल यह बन चुका है कि संगठन और दिल्ली अगली चाल कब चलेंगे।
पावर सेंटर शिफ्ट हो चुका है और यह बदलाव अब छुपा नहीं रह गया है। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के पद संभालते ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अदृश्य लेकिन बेहद गहरी लकीर खिंच गई। यह लकीर सरकार और संगठन के बीच है। जैसे ही मंत्रियों और विधायकों को यह समझ में आया कि अब सत्ता का असली रिमोट कंट्रोल मुख्यमंत्री आवास में नहीं बल्कि संगठन और दिल्ली के पास है, वैसे ही लखनऊ से लेकर दिल्ली तक हाजिरी लगाने का सिलसिला शुरू हो गया।

संदेश साफ है अब कुर्सी योगी नहीं, पंकज चौधरी और अमित शाह बचाएंगे। पंकज चौधरी के लखनऊ स्थित नैमिषारण्य गेस्ट हाउस को इन दिनों सत्ता का नया दरबार माना जा रहा है। मकर संक्रांति के बाद संभावित मंत्रिमंडल फेरबदल की चर्चाओं ने मंत्रियों की बेचैनी को कई गुना बढ़ा दिया है। यही वजह है कि एक के बाद एक मंत्री प्रदेश अध्यक्ष से मुलाकात करते नजर आ रहे हैं। कोई अपने विभाग के विकास कार्यों की फाइल लेकर पहुंच रहा है तो कोई संगठन के प्रति अपनी निष्ठा जताने। लेकिन इन तमाम मुलाकातों का असली उद्देश्य एक ही है किसी भी कीमत पर सत्ता में बने रहना। राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) कपिल देव अग्रवाल, राज्य मंत्री संदीप सिंह, मंत्री असीम अरुण और कैबिनेट मंत्री दारा सिंह चौहान जैसे कई नाम इस सूची में शामिल हैं। ये मुलाकातें सिर्फ औपचारिक नहीं हैं, बल्कि आने वाले बड़े फैसलों की भूमिका मानी जा रही हैं।
संगठन और सरकार के बीच समन्वय की बात जरूर कही जा रही है, लेकिन अंदरखाने यह साफ है कि यह समन्वय नहीं, बल्कि नियंत्रण की लड़ाई है। सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में गुजरात मॉडल लागू करने की पूरी तैयारी है। जिस तरह गुजरात में एक झटके में पूरी कैबिनेट बदल दी गई थी, वैसा ही प्रयोग यूपी में भी हो सकता है। दावा किया जा रहा है कि 70 फीसदी से ज्यादा मंत्रियों को बदला जा सकता है। खास तौर पर वे चेहरे जो 2017 से लेकर 2022 तक लगातार सत्ता में बने हुए हैं, सबसे ज्यादा खतरे में हैं। कई वरिष्ठ मंत्री यह मानकर चल रहे हैं कि इस बार सिर्फ विभाग बदलने तक बात सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरी तरह से बाहर का रास्ता भी दिखाया जा सकता है। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि कैबिनेट विस्तार में जातीय समीकरणों का खास ध्यान रखा जाएगा।
प्रदेश अध्यक्ष कुर्मी समाज से आते हैं और इसका असर मंत्रिमंडल में भी देखने को मिल सकता है। 2 से 3 कुर्मी नेताओं की कैबिनेट में एंट्री की अटकलें तेज हैं। इसे केवल सामाजिक संतुलन नहीं, बल्कि संगठन की सत्ता को मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। पंकज चौधरी की इस पूरी राजनीतिक चाल की सबसे बड़ी ताकत उनका मजबूत नेटवर्क माना जा रहा है। केशव प्रसाद मौर्य से लेकर अमित शाह तक, संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर उनके संपर्क बेहद मजबूत हैं।
प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के लगभग हर कोने में संगठनात्मक यात्राएं कीं, विधायकों से बंद कमरे में मुलाकातें कीं और धीरे-धीरे सभी को अपने एजेंडे से जोड़ लिया। नतीजा यह है कि आज विधायक और मंत्री खुलकर यह कहने लगे हैं कि टिकट मुख्यमंत्री नहीं, संगठन और दिल्ली तय करेगा। यही वह बिंदु है जहां से योगी आदित्यनाथ और संगठन के बीच तनाव और गहरा हो जाता है। किसी से छुपा नहीं है कि पंकज चौधरी और योगी के बीच तालमेल उतना सहज नहीं रहा है। ऊपर से अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के बीच ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद नंबर दो’ की मानी जा रही अंदरूनी प्रतिस्पर्धा ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है।
योगी की स्वतंत्र और आक्रामक कार्यशैली पर लगातार अंकुश लगाने की कोशिशें की जा रही हैं। योगी आदित्यनाथ का वह बयान भी इसी संघर्ष की कड़ी माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने साफ कहा था कि अगर विधायक और मंत्री मेहनत नहीं करेंगे तो कोई भी टिकट नहीं बचा पाएगा। इस बयान के बाद संगठन की ओर से यह संदेश गया कि टिकट की चाबी अभी भी उनके हाथ में है। राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि कई मंत्रियों और विधायकों को साफ तौर पर कहा गया है कि काम करते रहिए, टिकट की चिंता संगठन करेगा। इस पूरे घटनाक्रम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नजर बेहद गहरी है।
संघ पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि योगी आदित्यनाथ की छवि को कमजोर करने या उनके खिलाफ माहौल बनाने की कोशिशें बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। यही वजह है कि माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में आरएसएस की ओर से कोई बड़ा संकेत या बयान सामने आ सकता है, जो इस पूरी लड़ाई की दिशा बदल देगा। उत्तर प्रदेश की राजनीति अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां से पीछे लौटना आसान नहीं है। एक तरफ योगी आदित्यनाथ अपनी लोकप्रियता, प्रशासनिक सख्ती और हिंदुत्व के एजेंडे के साथ आगे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ संगठन और दिल्ली सत्ता की कमान पूरी तरह अपने हाथ में लेने की कोशिश में जुटे हैं। यह टकराव अब दबा हुआ नहीं रहा, बल्कि खुलकर सामने आ रहा है। सवाल अब यह नहीं है कि बदलाव होगा या नहीं, बल्कि यह है कि पहला बड़ा धमाका कब होगा। यूपी की सियासत में तापमान लगातार बढ़ रहा है और संकेत साफ हैं—बहुत जल्द कोई बड़ा फैसला इस राजनीति को पूरी तरह नई दिशा दे सकता है।





