Home Political news UGC के बहाने योगी पर निशाना ! असली कहानी सुनकर यूपी से...

UGC के बहाने योगी पर निशाना ! असली कहानी सुनकर यूपी से दिल्ली तक मचा बवाल !

99
0

देश की राजनीति इस वक्त सुलगते अंगारों पर खड़ी है जहाँ ज़रा-सी चिंगारी और पूरा माहौल धधक सकता है। लगातार सड़कों पर हंगामा, प्रदर्शन और नारों की गूंज सुनाई दे रही है। ऊपर से देखने पर लगता है कि ये अलग-अलग मुद्दों का आक्रोश है, लेकिन भीतर झाँककर देखें तो तस्वीर कहीं ज़्यादा गहरी और बेचैन करने वाली नज़र आती है। बार-बार एक ही सवाल उठता है—क्या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को घेरने और कमजोर करने की एक बड़ी, सुनियोजित साज़िश इस वक्त सड़कों से लेकर सत्ता के गलियारों तक चल रही है? देश की सियासत में कुछ भी यूँ ही नहीं होता। हर आंदोलन, हर नारा और हर खामोशी के पीछे कोई न कोई रणनीति ज़रूर होती है। सवाल यह नहीं है कि विरोध क्यों हो रहा है, सवाल यह है कि विरोध की दिशा किस ओर मोड़ी जा रही है। और जब हर मुद्दा, हर बहस और हर विवाद अंततः उत्तर प्रदेश और योगी आदित्यनाथ पर आकर ठहरता है, तो संयोग मानना मुश्किल हो जाता है।


अब राजनीतिक गलियारों में यह बात खुलकर कही जाने लगी है कि UGC केवल एक नीतिगत फैसला नहीं है, बल्कि एक सियासी औज़ार बन चुका है। कहा जा रहा है कि इस कानून को इसीलिए लाया गया ताकि उत्तर प्रदेश में सवर्ण समाज को योगी आदित्यनाथ से नाराज़ किया जा सके और उसी बहाने भारतीय जनता पार्टी से भी दूरी पैदा हो। राजनीतिक गणित बिल्कुल साफ़ है अगर सवर्ण समाज बीजेपी से खिसकता है तो सीटों का नुकसान तय है, और सीटों का नुकसान हुआ तो उसका सीधा असर योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता पर पड़ेगा। यानी ऊपर से हमला पार्टी पर दिखता है, लेकिन भीतर से असली निशाना योगी आदित्यनाथ ही हैं। UGC के विरोध में देश के अलग-अलग हिस्सों में जो नारे लगे, उन्होंने इस पूरी रणनीति को और उजागर कर दिया। “योगी तुझे बाहर नहीं, मोदी तेरी खैर नहीं” जैसे नारे यह साफ़ संकेत देते हैं कि ज़मीन पर मौजूद लोग यह समझ रहे हैं कि यह फैसला उत्तर प्रदेश सरकार का नहीं है। लोग जानते हैं कि इसमें योगी आदित्यनाथ की सीधी भूमिका नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी दिल्ली में बैठे शीर्ष नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर जाती है। यही वजह है कि योगी पर सीधे हमला नहीं किया जा रहा, बल्कि विरोध की धार दिल्ली की ओर मोड़ी जा रही है।


यहीं से सत्ता के भीतर चल रही खींचतान और साफ़ दिखाई देने लगती है। अगर जनता जानती है कि गलती योगी की नहीं है, तो सवाल उठता है कि फिर योगी को ही क्यों घेरा जा रहा है? राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक़, दिल्ली में बैठे कुछ नेताओं को यह डर लगातार सताता रहा है कि अगर योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक ग्राफ इसी तरह ऊपर जाता रहा, तो 2029 में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी अपने-आप उनके नाम जुड़ जाएगी। यही डर 2027 से पहले संतुलन बिगाड़ने की कोशिशों में बदलता दिख रहा है। योगी आदित्यनाथ की समस्या और ताक़त दोनों एक ही हैं—उनके खिलाफ़ सीधा हमला करना आसान नहीं है। न भ्रष्टाचार का कोई बड़ा आरोप, न निजी जीवन पर सवाल, न कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर कोई बड़ी विफलता। इसलिए रणनीति बदलती है। समाज को नाराज़ किया जाता है, संगठन को उलझाया जाता है और नेता को धीरे-धीरे अकेला दिखाने की कोशिश होती है।

SIR के मुद्दे पर भी यही पैटर्न दिखाई दिया। योगी आदित्यनाथ ने साफ़ निर्देश दिए थे कि विधायक, मंत्री और कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्रों में नाम जुड़वाएँ ताकि किसी भी मतदाता का नाम न कटे। इसके बावजूद शिकायतें संगठन के ज़रिये सीधे दिल्ली पहुँचीं। यह माहौल बनाया गया कि कार्यकर्ताओं की नहीं सुनी जा रही और दबाव डाला जा रहा है। अंततः ज़िम्मेदारी पूरी तरह योगी के कंधों पर डाल दी गई। पंकज चौधरी का यह बयान कि “ड्राइविंग सीट पर योगी बैठे हैं” इसी राजनीतिक क्रम का हिस्सा माना जा रहा है। प्रयागराज की घटना ने इस पूरी कहानी को और धार दी। माघ मेला, भारी भीड़ और सुरक्षा को देखते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का रथ रोका जाना प्रशासनिक रूप से सही फैसला था। लेकिन इसके बाद जो माहौल बना, वह सामान्य नहीं था। अचानक वही चेहरे मुखर हो गए जो आमतौर पर हिंदू मुद्दों पर चुप रहते हैं।

भाजपा के बड़े नेताओं की खामोशी बनी रही और उसी बीच केशव प्रसाद मौर्य का बयान आया कि जो हुआ गलत हुआ, जांच होगी और दोषी नहीं बचेंगे। इसके बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी द्वारा केशव मौर्य को “अच्छा मुख्यमंत्री” बताना इस घटना को एक राजनीतिक संकेत में बदल देता है। RSS की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में सबसे संवेदनशील मानी जा रही है। पहले साफ़ संकेत दिए गए थे कि योगी पर सामने से हमला करने वालों को संघ पसंद नहीं करेगा। उस समय ऐसा लगा कि RSS पूरी मजबूती से योगी के साथ खड़ा है। लेकिन हाल के दिनों में तस्वीर बदली हुई दिखती है। समर्थन अब बैकडोर तक सीमित है, खुलकर मैदान में आने से संघ भी बचता नज़र आ रहा है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि संघ खुद भारी दबाव का सामना कर रहा है। इन सब घटनाओं को अलग-अलग देखकर समझना भूल होगी। UGC विवाद, SIR का मुद्दा, प्रयागराज प्रकरण, बयानबाज़ी और चुनिंदा खामोशी—ये सब एक सुनियोजित राजनीतिक क्रम का हिस्सा हैं। असल लड़ाई किसी कानून या प्रक्रिया की नहीं है, बल्कि उस कुर्सी की है, जो आने वाले वर्षों में देश की दिशा तय करेगी। यही वजह है कि आज देश की राजनीति सुलगते अंगारों पर खड़ी है। क्योंकि जब जनता सच समझने लगती है और सवाल पूछने लगती है, तब सत्ता के भीतर सबसे बड़ी बेचैनी पैदा होती है। और शायद यही बेचैनी आने वाले समय में देश की राजनीति की दिशा तय करने वाली है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here