Home Crime पुलिस की बेरुख़ी ने छीन लिया आख़िरी हक़

पुलिस की बेरुख़ी ने छीन लिया आख़िरी हक़

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लापरवाही के चलते लावारिस जला दी गई नाबालिग शीतल की लाश, परिवार इंसाफ़ को भटक रहा

लखनऊ | लखनऊ में एक बार फिर पुलिस की संवेदनहीनता और लापरवाही ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। पारा थाना क्षेत्र के डूडा कॉलोनी निवासी 16 वर्षीय नाबालिग शीतल का भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद उसकी लाश को “लावारिस” बताकर अंतिम संस्कार कर दिया गया। परिजन आज भी इस सवाल से जूझ रहे हैं कि जब बेटी की गुमशुदगी की सूचना समय पर दी गई थी, तो फिर शव की पहचान क्यों नहीं कराई गई?

गुमशुदगी की तहरीर, लेकिन तलाश के बजाय टालमटोल

पीड़ित परिवार का आरोप है कि 13 जनवरी की शाम शीतल घर से शाल ओढ़कर निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। रातभर तलाश के बाद 14 जनवरी को पिता राज किशोर हंसखेड़ा पुलिस चौकी पहुंचे और चौकी इंचार्ज उपनिरीक्षक मुन्ना लाल को बेटी की गुमशुदगी की लिखित सूचना दी।
परिवार का कहना है कि पुलिस ने गंभीरता दिखाने के बजाय यह कहकर टाल दिया कि “लड़की किसी दोस्त के साथ गई होगी, लौट आएगी।” अगर उसी वक्त तलाश शुरू होती, तो शायद आज तस्वीर कुछ और होती।

इंस्टाग्राम कॉल से अगवा कर हत्या का आरोप

परिजनों के अनुसार, 13 जनवरी को ही शीतल को अंशू यादव ने इंस्टाग्राम कॉल कर एसबीएन स्कूल के पास बुलाया था। आरोप है कि अंशू की कार में पहले से चार अन्य युवक मौजूद थे। शीतल के पहुंचते ही उसे जबरन कार में बैठाया गया और बाद में गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी गई।
हत्या के बाद शव को सरोजनीनगर थाना क्षेत्र के पिपरसंड रेलवे ट्रैक पर फेंक दिया गया। पुलिस को युवती का सिर धड़ से अलग हालत में शव मिला।

72 घंटे तक शव पड़ा रहा, फिर “लावारिस” बताकर कर दिया अंतिम संस्कार

सरोजनीनगर पुलिस ने शव को करीब 72 घंटे तक पोस्टमार्टम हाउस में रखा, लेकिन पहचान कराने की कोई ठोस कोशिश नहीं की गई। न तो पारा थाना को प्रभावी ढंग से सूचित किया गया और न ही गुमशुदगी से मिलान कराया गया।
नतीजा यह हुआ कि 16 जनवरी को शव को लावारिस बताकर अंतिम संस्कार कर दिया गया।

जिस दिन शव जलाया गया, उसी दिन दर्ज हुई एफआईआर

परिजनों का आरोप है कि 14 जनवरी से चौकी के चक्कर काटने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की गई। 16 जनवरी को अचानक पुलिस ने फोन कर रिपोर्ट दर्ज होने की जानकारी दी और एफआईआर की कॉपी थमा दी—उसी दिन जब शीतल का अंतिम संस्कार किया जा चुका था।
यह सवाल बेहद गंभीर है कि अगर समय रहते मुकदमा दर्ज होता, तो क्या शव की पहचान और परिजनों को सौंपने की प्रक्रिया नहीं हो सकती थी?

दस दिन तक छिपाया गया हत्या का सच!

पिता राजकिशोर का आरोप है कि पुलिस को 15 जनवरी तक बेटी की हत्या की जानकारी हो चुकी थी, इसके बावजूद परिजनों को अंधेरे में रखा गया। 25 जनवरी की रात चौकी इंचार्ज मुन्ना लाल ने उन्हें थाने बुलाया, लेकिन वहां भी सीधे कुछ नहीं बताया गया।
बाद में फोटो दिखाकर हत्या की जानकारी दी गई और बताया गया कि चार आरोपियों—अंशू गौतम, आशिक यादव, रिशू यादव और वैभव सिंह—को गिरफ्तार किया गया है। एक अन्य आरोपी की तलाश जारी बताई जा रही है।

शव की हालत ने बढ़ाई दरिंदगी की आशंका

परिजनों ने गंभीर आशंका जताई है कि हत्या से पहले शीतल के साथ बड़ी घटना को अंजाम दिया गया। पिता का कहना है कि जब बेटी घर से निकली थी, तब उसने जैकेट और शाल पहन रखी थी, लेकिन पुलिस द्वारा दिखाई गई तस्वीर में शव से कुछ दूरी पर कपड़े पड़े नजर आए।
यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है, जिनका जवाब अब तक पुलिस ने नहीं दिया है।

किस मुंह से बताएं?—थाने में हुई मीटिंग की चर्चा

परिवार का दावा है कि 25 जनवरी की रात थाने में सर्किल स्तर के अधिकारियों की बैठक हुई, जिसमें यह तय किया गया कि परिजनों को हत्या की जानकारी किस तरह दी जाए। यह चर्चा खुद में पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

इंसाफ की मांग, पुलिस पर कार्रवाई की उठी आवाज

आज शीतल का परिवार सिर्फ एक सवाल पूछ रहा है—
अगर पुलिस ने समय पर अपनी जिम्मेदारी निभाई होती, तो क्या एक बेटी को “लावारिस” जलाया जाता?
मामला सिर्फ हत्या का नहीं, बल्कि पुलिस की लापरवाही, संवेदनहीनता और जवाबदेही का है। अब जरूरत है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो और दोषी पुलिसकर्मियों पर भी सख्त कार्रवाई की जाए।

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