ईरान के सुप्रीम लीडर के निधन की खबर सामने आने के बाद पूरे मध्य पूर्व में हलचल तेज हो गई है। कई देशों में अमेरिका और इज़रायल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ गई है और दुनिया की निगाहें तेहरान पर टिक गई हैं।
तीन दशक से अधिक समय तक सत्ता का केंद्र
86 वर्षीय अयातुल्लाह अली खामेनेई वर्ष 1989 से ईरान के सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक नेता थे। वे ईरान के दूसरे सुप्रीम लीडर बने थे। उनसे पहले यह पद इस्लामी क्रांति के जनक रूहोल्लाह खामनेई के पास था। खामेनेई का राजनीतिक जीवन संघर्षों से भरा रहा। 1963 में शाह के खिलाफ आंदोलन में भाग लेने पर उन्हें जेल और यातनाएं झेलनी पड़ीं।
1979 की इस्लामी क्रांति में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और क्रांति के बाद सत्ता के केंद्र में उभरते गए।
साल 1981 में तेहरान की अबूजर मस्जिद में हुए बम धमाके में खामेनेई गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इस हमले के बाद उनका दाहिना हाथ लकवाग्रस्त हो गया और एक कान से सुनने की क्षमता चली गई। उसी वर्ष वे ईरान के राष्ट्रपति बने और दो कार्यकाल तक इस पद पर रहे।
1989 में रूहोल्लाह खोमेनी के निधन के बाद खामेनेई को ईरान का सुप्रीम लीडर चुना गया। ईरान की शासन व्यवस्था में सुप्रीम लीडर ही अंतिम निर्णय लेने वाला प्राधिकरण होता है।
खामेनेई के नेतृत्व में ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाया, जिससे अमेरिका और इज़रायल के साथ रिश्ते लगातार तनावपूर्ण रहे।
उनके कार्यकाल में पश्चिमी देशों के साथ प्रतिबंध, वार्ताएं और टकराव — तीनों का दौर चलता रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि खामेनेई सिर्फ धार्मिक नेता नहीं थे, बल्कि वे वह केंद्रीय व्यक्तित्व थे जिनके निर्णयों ने तीन दशकों तक मध्य पूर्व की राजनीति की दिशा तय की।
उनके निधन के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है:
क्या ईरान में सत्ता परिवर्तन शांतिपूर्ण तरीके से होगा? क्या अमेरिका-इज़रायल और ईरान के बीच टकराव नई दिशा लेगा?
फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें तेहरान पर हैं। आने वाले दिनों में ईरान की सत्ता संरचना और नए नेतृत्व को लेकर उठने वाले कदम मध्य पूर्व की राजनीति पर गहरा असर डाल सकते हैं।






