मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच इन दिनों स्टेट ऑफ हार्मुज़ को लेकर पूरी दुनिया में चर्चा तेज हो गई है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में गिने जाने वाले इस रास्ते से हर दिन लाखों बैरल कच्चा तेल और गैस दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचती है। दुनिया के समुद्री रास्तों से होने वाले तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख तेल उत्पादक देश—सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई और कतर—अपना तेल और गैस इसी रास्ते से एशिया, यूरोप और अन्य देशों तक भेजते हैं। इसी वजह से इसे दुनिया की सबसे अहम “एनर्जी चोक-पॉइंट” भी कहा जाता है। अगर इस रास्ते में किसी भी तरह का सैन्य तनाव, संघर्ष या नाकेबंदी होती है तो इसका असर तुरंत वैश्विक बाजार पर दिखने लगता है।
स्टेट ऑफ हार्मुज़ में किसी भी तरह का संकट केवल तेल सप्लाई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार की पूरी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। तेल और गैस की कीमतें बढ़ जाती हैं – सप्लाई बाधित होने का डर होते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ जाते हैं।
शिपिंग लागत बढ़ती है – जहाज कंपनियां जोखिम बढ़ने पर बीमा और परिवहन शुल्क बढ़ा देती हैं।
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। ऐसे में अगर स्टेट ऑफ हार्मुज़ में तनाव बढ़ता है तो भारत में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन लागत और महंगाई पर असर पड़ सकता है। अगर कभी इस समुद्री मार्ग को बंद करने जैसी स्थिति बनती है तो दुनिया के ऊर्जा व्यापार का बड़ा हिस्सा प्रभावित हो सकता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में होने वाली हर गतिविधि पर दुनिया की सरकारें और ऊर्जा बाजार लगातार नजर रखते हैं।
कुल मिलाकर, स्टेट ऑफ हार्मुज़ केवल एक समुद्री रास्ता नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की धुरी माना जाता है। इसीलिए यहां पैदा होने वाला हर तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन जाता है।





