राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक Mohan Bhagwat ने एक कार्यक्रम के दौरान ‘सेवा’ और उसके बदलते स्वरूप को लेकर महत्वपूर्ण बात कही, उन्होंने संकेत दिया कि कई बार सेवा करने वाले लोग अचानक बढ़ जाते हैं, जिसे वे चुनावी माहौल से जोड़कर देखते हैं, यह बयान नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान दिया गया, जहां महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पिताजी के नाम पर गंगाधर राव फडणवीस मेमोरियल डायग्नोस्टिक सेंटर का उद्घाटन किया गया, इसी अवसर पर संबोधन देते हुए उन्होंने सेवा के वास्तविक अर्थ और उसकी प्रकृति पर विस्तार से चर्चा की।
सेवा कोई उपकार नहीं, बल्कि कर्तव्य है
अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि भारतीय परंपरा में ‘सेवा’ को उपकार नहीं बल्कि कर्तव्य माना गया है, उन्होंने स्पष्ट किया कि जब कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से, बिना स्वयं के हित की चिंता किए कार्य करता है, तभी उसे सच्ची सेवा कहा जा सकता है, उन्होंने यह भी कहा कि सेवा के माध्यम से व्यक्ति का मन शुद्ध होता है, मानव स्वभाव में कई प्रकार के विचार और भावनाएं होती हैं, लेकिन जब व्यक्ति दूसरों की सहायता करता है और खुद को भूलकर कार्य करता है, तो वह अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन अनुभव करता है।
चुनाव और सेवा के बीच संबंध पर टिप्पणी
अपने संबोधन में उन्होंने यह भी कहा “जब हम देखते हैं कि सेवा करने वाले लोग बड़ी संख्या में दिखने लगते हैं, तो हमें अंदाजा हो जाता है कि आसपास चुनाव हैं, ” उन्होंने यह संकेत दिया कि कई बार सेवा के पीछे अलग-अलग प्रेरणाएं होती हैं, जिनमें स्वार्थ, दबाव या परिस्थितियां भी शामिल हो सकती हैं, उनके अनुसार, ऐसी सेवा हमेशा टिकाऊ नहीं होती, क्योंकि जब उद्देश्य पूरा हो जाता है, तो लोग उस कार्य से दूर हो सकते हैं।
सेवा के पीछे विभिन्न कारण
भागवत ने यह भी उल्लेख किया कि सेवा हमेशा एक ही कारण से नहीं होती। उन्होंने बताया कि कई बार सेवा स्वार्थ के कारण होती है, कभी यह मजबूरी का परिणाम होती है और कुछ मामलों में डर भी इसका कारण हो सकता है, उन्होंने कहा कि वास्तविक सेवा वही है, जिसमें व्यक्ति बिना किसी अपेक्षा के समाज के लिए कार्य करता है।
पुराने बयान का भी किया जिक्र
उन्होंने इससे पहले भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए थे, जहां उन्होंने कहा था कि “सच्चा सेवक अहंकारी नहीं होता,” उनका मुख्य संदेश यही रहा है कि चुनाव के समय सेवा का प्रदर्शन बढ़ जाता है, लेकिन सच्ची सेवा वह है जो निरंतर और बिना दिखावे के की जाए, मोहन भागवत का यह बयान एक बार फिर इस बहस को सामने लाता है कि ‘सेवा’ वास्तव में कितनी निस्वार्थ होती है और कितनी परिस्थितियों से प्रभावित। उनके अनुसार, सच्ची सेवा वही है जो बिना प्रचार, बिना स्वार्थ और बिना किसी अपेक्षा के निरंतर समाज के लिए की जाए।






