Home Political news दलितों को अखिलेश कबूल नहीं! एक तस्वीर ने एकता की उड़ा धज्जियां?

दलितों को अखिलेश कबूल नहीं! एक तस्वीर ने एकता की उड़ा धज्जियां?

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पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई सोशल इंजीनियरिंग की चर्चा तेज थी। कहा जा रहा था कि 2027 के विधानसभा चुनाव में यादव और दलित वोट बैंक अगर एकजुट हो गए तो बीजेपी के लिए सत्ता की राह मुश्किल हो सकती है। PDA फार्मूले के बाद यह कयास भी लगाए जा रहे थे कि इस बार दलित और यादव समाज मिलकर सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिख सकते हैं। लेकिन इसी बीच एक मुलाकात ने इस संभावित एकता पर सवाल खड़े कर दिए। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और बाबा साहेब अंबेडकर के परपोते राजरत्न आंबेडकर की मुलाकात ने सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी। यह मुलाकात जहां सपा के लिए एक राजनीतिक संदेश मानी जा रही थी, वहीं कई दलित नेताओं को यह बिल्कुल भी रास नहीं आई।हालात यहां तक पहुंच गए कि कुछ दलित संगठनों और नेताओं ने खुलकर राजरत्न आंबेडकर और अखिलेश यादव पर निशाना साधना शुरू कर दिया।

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सोशल मीडिया पर भी इस मुलाकात को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं और देखते ही देखते यह मुलाकात एक बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गई। दरअसल इस मुलाकात के दौरान राजरत्न आंबेडकर का दिया नारा — “मिले अंबेडकर और अखिलेश, खुलेंगे साधुओं के भेष” — सियासी गलियारों में आग की तरह फैल गया। इसके बाद सोशल मीडिया पर उन्हें जबरदस्त ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा। कई दलित संगठनों ने सवाल उठा दिया कि क्या अंबेडकर परिवार का सदस्य अब समाजवादी पार्टी के साथ खड़ा होने जा रहा है? बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल का बयान भी चर्चा में आ गया जिसमें उन्होंने साफ कहा कि अंबेडकर परिवार में जन्म लेने से कोई उनकी विचारधारा का वारिस नहीं हो जाता। वहीं कई बहुजन नेताओं का यह भी कहना था कि अगर कोई विकल्प चुनना है तो चंद्रशेखर आजाद या मायावती हो सकते हैं, लेकिन अखिलेश यादव नहीं। यही से असली सवाल खड़ा हो गया — क्या दलित राजनीति में अखिलेश यादव को स्वीकार करने को लेकर अंदरूनी विरोध है? क्या PDA की राजनीति के बावजूद दलित नेतृत्व का एक वर्ग अभी भी सपा से दूरी बनाए रखना चाहता है?फिलहाल यह विवाद एक मुलाकात से ज्यादा बन चुका है। यह उत्तर प्रदेश की उस सियासी लड़ाई का संकेत है जहां 2027 से पहले दलित वोट बैंक की दिशा तय होने वाली है… और सवाल यही है — क्या अखिलेश दलित राजनीति में जगह बना पाएंगे या विरोध की दीवार और ऊंची होगी?

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