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अतिक्रमण और सरकारी लापरवाही का शिकार एनसीआर के लुप्त होते जलाशय, आखिर लापता तालाबों पर सन्नाटा क्यों?

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अतिक्रमण और सरकारी लापरवाही का शिकार एनसीआर के लुप्त होते जलाशय, आखिर लापता तालाबों पर सन्नाटा क्यों?

दिल्ली-एनसीआर में बढ़ती गर्मी, गिरता भूजल स्तर और हर साल गहराता जल संकट अब बड़े खतरे का संकेत बन चुका है। ऐसे में डीडीए द्वारा शुरू किया गया ‘जल संचय अभियान’ उम्मीद की एक नई किरण माना जा रहा है। इस अभियान के तहत 101 पारंपरिक जल निकायों के जीर्णोद्धार, संरक्षण और पुनर्जीवन की योजना बनाई गई है। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि आखिर वे सैकड़ों तालाब और जलाशय कहां गायब हो गए, जो कभी दिल्ली-एनसीआर की जीवनरेखा माने जाते थे?

अवैध कब्जों ने खत्म कर दिए तालाब

दिल्ली और एनसीआर के कई इलाकों में प्राकृतिक जलाशय अब अवैध कब्जों की भेंट चढ़ चुके हैं। कहीं उन पर पक्की कॉलोनियां बना दी गईं, तो कहीं झुग्गियां बस गईं। कई तालाबों का अस्तित्व अब सिर्फ पुराने राजस्व रिकॉर्ड और खसरा-खतौनी तक सीमित रह गया है।

आंकड़े क्यों बढ़ा रहे चिंता?

करीब 25 साल पहले दिल्ली में 1000 से ज्यादा छोटे-बड़े जलाशय चिन्हित किए गए थे, लेकिन अब इनमें से 300 से अधिक जलाशय “लापता” या “अतिक्रमित” श्रेणी में पहुंच चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन जलाशयों के खत्म होने से भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और गर्मियों में पानी का संकट और गंभीर होता जा रहा है।

आखिर क्यों विफल हो रहीं योजनाएं?

अमृत सरोवर जैसी योजनाएं शुरू तो हुईं, लेकिन विभागीय लापरवाही और इच्छाशक्ति की कमी के कारण ज्यादातर योजनाएं फाइलों तक ही सीमित रह गईं। पर्यावरणविदों का कहना है कि तालाबों के नाम पर सिर्फ कंक्रीट के पाथवे और पार्क बनाए गए, जबकि असली जरूरत उनके प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने की थी।

गायब होने के बड़े कारण

  • अवैध कॉलोनियों का निर्माण
  • तालाबों में मलबा और सीवेज डंपिंग
  • कैचमेंट एरिया और प्राकृतिक नालों का खत्म होना
  • भूजल का अत्यधिक दोहन

एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी

विशेषज्ञ मानते हैं कि दिल्ली में मल्टी-एजेंसी सिस्टम भी बड़ी समस्या है। किसी तालाब की जमीन डीडीए के पास है, देखरेख एमसीडी करती है और पानी की जिम्मेदारी जल बोर्ड पर होती है। इसी तालमेल की कमी के कारण वर्षों तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी।

जलाशयों के पुनर्जीवन से क्या होगा फायदा?

  • भूजल स्तर में सुधार
  • गर्मियों में पानी की किल्लत कम होगी
  • हीट वेव और ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव घटेगा
  • मानसून में जलभराव और बाढ़ की समस्या कम होगी

अब क्या हो रहा है?

दिल्ली जल बोर्ड अब ‘सिटी ऑफ लेक्स’ प्रोजेक्ट के तहत कई सूख चुके जलाशयों को एसटीपी के शोधित पानी से दोबारा भरने की योजना पर काम कर रहा है। हालांकि सवाल अब भी कायम है कि क्या सरकारी एजेंसियां समय रहते इन जलाशयों को बचा पाएंगी… या फिर आने वाले वर्षों में दिल्ली-एनसीआर पूरी तरह जल संकट की गिरफ्त में आ जाएगा?

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