दिल्ली की रोहिणी कोर्ट ने छह साल की बच्ची से दुष्कर्म के मामले में 67 वर्षीय दोषी को 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है, अदालत ने स्पष्ट कहा कि बच्चों के खिलाफ बढ़ते यौन अपराधों पर रोक लगाने के लिए कड़ा संदेश देना आवश्यक है, ताकि समाज में ऐसे अपराधों के प्रति भय और जवाबदेही बनी रहे।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अजय नागर ने सजा सुनाते हुए कहा कि घटना के समय पीड़िता की उम्र महज छह वर्ष थी, जबकि दोषी उम्रदराज था, अदालत ने टिप्पणी की कि इस तरह के गंभीर अपराधों में नरमी की कोई गुंजाइश नहीं है, न्यायालय ने कहा कि बच्चों के खिलाफ अपराध लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं और ऐसे मामलों में कठोर दंड समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है।
अभियोजन पक्ष ने रखी सख्त सजा की मांग
दिल्ली पुलिस की ओर से पेश विशेष लोक अभियोजक ने अदालत में दलील दी कि इस अपराध का मानसिक आघात पीड़िता के साथ जीवनभर रहेगा। इसलिए दोषी को किसी भी प्रकार की रियायत नहीं दी जानी चाहिए, अभियोजन पक्ष ने इसे अत्यंत गंभीर अपराध बताते हुए कठोरतम सजा की मांग की।
अदालत ने दोषी की परिस्थितियों पर भी किया विचार
सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि दोषी आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से है, उसका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य है, उसके परिवार में एक बेटी और छह नातिनें भी हैं हालांकि, अदालत ने कहा कि इतनी गंभीर प्रकृति के अपराध में ये परिस्थितियां सजा कम करने का आधार नहीं बन सकतीं।
अदालत ने दोषी को पॉक्सो अधिनियम की धारा 5 और धारा 6 के तहत 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके अलावा उस पर 5,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।
पीड़िता को 10.50 लाख रुपये का मुआवजा
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पीड़िता को सम्मान और सुरक्षा के साथ भविष्य का जीवन जीने के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता है, इसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने पीड़िता को 10.50 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, ताकि उसके पुनर्वास, शिक्षा और बेहतर भविष्य में मदद मिल सके।
अदालत ने अपने फैसले में दोहराया कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल दोषियों को दंडित करना ही नहीं, बल्कि पीड़ितों के पुनर्वास और समाज में ऐसे अपराधों की रोकथाम के लिए स्पष्ट संदेश देना भी है।






