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दलित प्रेम में उलझी बीजेपी, रूठ गए ब्राह्मण? 2027 से पहले 120 सीटों का सताया डर!

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क्या बीजेपी के सबसे भरोसेमंद माने जाने वाले ब्राह्मण अब पार्टी से दूरी बनाने लगे हैं? क्या 2027 से पहले भाजपा को अपने ही वोट बैंक को मनाने के लिए ब्राह्मणों के चरणों में बैठना पड़ रहा है? अचानक दलित राजनीति में व्यस्त बीजेपी को अब ब्राह्मणों की नाराजगी का डर क्यों सताने लगा है। यही वजह है कि बृजेश पाठक से लेकर मनोज पांडे तक को मैदान में उतार दिया गया है।

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सवाल यह है कि अगर 12 से 15 फीसदी ब्राह्मणों ने रुख बदल लिया तो क्या 100 से 150 सीटों का पूरा गणित बिगड़ जाएगा? दरअसल, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा अपने परंपरागत ब्राह्मण वोट बैंक को साधने की कोशिश में जुटी हुई है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पिछले कुछ समय में कई ऐसे विवाद सामने आए, जिन्होंने ब्राह्मण समाज के एक वर्ग में नाराजगी को हवा दी। सोशल मीडिया पर एनसीईआरटी की सामग्री, कुछ भर्ती परीक्षाओं में पूछे गए सवाल, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की परीक्षा में सामने आए प्रश्न और “घूसखोर पंडित” जैसे विवादित संदर्भों को लेकर बहस छिड़ी, जिसके बाद ब्राह्मण समाज के कुछ संगठनों ने इसे अपमान और उपेक्षा से जोड़कर सवाल उठाए।

वहीं परशुराम जयंती पर बड़े स्तर पर कार्यक्रम नहीं होने को लेकर भी नाराजगी की चर्चाएं सामने आईं। इसी बीच उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक और मंत्री मनोज पांडे लगातार ब्राह्मण समाज के कार्यक्रमों में सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। बटुक सम्मान कार्यक्रमों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि पार्टी ब्राह्मण समाज के सम्मान और हितों के साथ खड़ी है। दूसरी तरफ भाजपा दलित वोट बैंक को साधने के लिए बाबा साहब अंबेडकर से जुड़े कार्यक्रमों और अभियानों पर विशेष जोर दे रही है। ऐसे में राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक ब्राह्मण वोट बैंक और नए सामाजिक समीकरणों के बीच संतुलन बनाने की है। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा अपने नाराज ब्राह्मण वोटरों को पूरी तरह मना पाएगी, या फिर 2027 से पहले उसका सबसे मजबूत सामाजिक आधार ही उसके लिए सबसे बड़ी चिंता बन जाएगा?