शाहजहांपुर। जिस मिट्टी ने देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमने वाले अमर क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह को जन्म दिया, उसी धरती को आजाद भारत में भी दशकों तक विकास की राह देखने को मजबूर होना पड़ा। शाहजहांपुर के नवादा गांव की तीन पीढ़ियां हर साल बारिश के मौसम में खन्नौत नदी के कारण मुख्यधारा से कटने का दर्द झेलती रहीं। लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बनी सरकार ने इस समस्या का स्थायी समाधान करते हुए खन्नौत नदी पर पक्के पुल का निर्माण कराया।
पुल बनने के बाद जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं शहीद ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि पहुंचे और उनके पैतृक घर पर श्रद्धांजलि अर्पित की, तो वर्षों की पीड़ा झेल रहे ग्रामीणों की आंखें नम हो गईं। ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ एक पुल का निर्माण नहीं था, बल्कि उस शहीद की जन्मभूमि को मिला सम्मान था, जिसकी प्रतीक्षा उन्हें दशकों से थी।
बारिश में चार-पांच महीने कट जाता था गांव
नवादा गांव के लिए खन्नौत नदी लंबे समय तक विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा बनी रही। नदी पर पक्का पुल नहीं होने के कारण बारिश और बाढ़ के दिनों में गांव का संपर्क आसपास के इलाकों से टूट जाता था। ग्रामीणों को चार से पांच महीने तक आवागमन की मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। मरीजों को अस्पताल पहुंचाना मुश्किल होता था, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती थी और किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने में परेशानी होती थी। गांव के लोगों के लिए यह समस्या एक-दो साल की नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही थी।
जब सीएम योगी तक पहुंची शहीद के गांव की पीड़ा
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद नवादा गांव के लोगों ने अपनी समस्या मुख्यमंत्री के सामने रखी। ग्रामीणों ने खन्नौत नदी पर स्थायी पुल की मांग की। शहीद की जन्मभूमि की इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 25 फरवरी 2018 को शाहजहांपुर में विकास परियोजनाओं के साथ खन्नौत नदी पर पक्के पुल, सड़कों और डिग्री कॉलेज जैसी परियोजनाओं को मंजूरी दी।
इसके बाद खन्नौत नदी पर पक्के पुल का निर्माण हुआ और वर्षों से बारिश में कटने वाले गांव को स्थायी सड़क संपर्क मिल गया।
पुल बनने के बाद खुद नवादा पहुंचे मुख्यमंत्री
30 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं नवादा गांव पहुंचे। उन्होंने अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके पैतृक परिवार के बुजुर्गों का सम्मान किया। मुख्यमंत्री के इस दौरे ने ग्रामीणों को भावुक कर दिया। जिन लोगों ने दशकों तक अपने गांव को बारिश में अलग-थलग पड़ते देखा था, उनके लिए यह क्षण बेहद खास था। ग्रामीणों ने इसे शहीद ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान को मिला सम्मान बताया।
कौन थे अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह?
ठाकुर रोशन सिंह का जन्म 19 दिसंबर 1892 को शाहजहांपुर जिले के नवादा गांव में ठाकुर जंगी सिंह और कौशल्या देवी के घर हुआ था। बचपन से ही वह साहसी, कुशल पहलवान और निशानेबाजी में माहिर थे। युवावस्था में वह महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े। बाद में उनका जुड़ाव हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से हुआ और वह क्रांतिकारी आंदोलन का सक्रिय हिस्सा बन गए।
बरेली में अंग्रेज अफसर की बंदूक छीन ली
1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद बरेली में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान अंग्रेज पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। इसी दौरान ठाकुर रोशन सिंह भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़े और एक अंग्रेज अधिकारी की बंदूक छीन ली। उन्होंने हवा में फायरिंग कर लाठीचार्ज रुकवाया।
इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। जेल से बाहर आने के बाद उनका जुड़ाव क्रांतिकारी गतिविधियों से और गहरा हो गया।
काकोरी कांड से भी जुड़ा नाम
दिसंबर 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ने संगठन के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से पीलीभीत की बिसलपुर तहसील के बमरौली गांव में कार्रवाई की। इस दौरान हुई गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत हो गई। ठाकुर रोशन सिंह पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ, लेकिन वह गिरफ्तारी से बच निकले।
इसके बाद 1925 के काकोरी कांड में ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारी संगठन से जुड़े लोगों पर शिकंजा कसा। ठाकुर रोशन सिंह को भी गिरफ्तार कर मुकदमे में शामिल किया गया। काकोरी ट्रेन एक्शन में प्रत्यक्ष रूप से शामिल न होने के बावजूद उन्हें संगठन से जुड़े होने के कारण दोषी ठहराया गया।
‘मुझे भी वही सजा दो जो बिस्मिल को मिली है’
अदालत में जब ठाकुर रोशन सिंह के खिलाफ सजा सुनाई जा रही थी, तब उन्होंने निर्भीकता से कहा कि उन्हें भी वही सजा दी जाए जो राम प्रसाद बिस्मिल को मिली है। ब्रिटिश अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। 19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में उन्होंने गीता का पाठ किया और वंदे मातरम् का उद्घोष करते हुए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया।
आजादी के बाद भी जारी रहा गांव का संघर्ष
देश आजाद हुआ, लेकिन शहीद ठाकुर रोशन सिंह का गांव नवादा लंबे समय तक बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करता रहा। खन्नौत नदी पर पक्का पुल नहीं होने के कारण गांव का संपर्क बारिश में टूट जाता था। अब पक्का पुल बनने के बाद हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। एंबुलेंस गांव तक आसानी से पहुंच रही है। छात्र स्कूल और कॉलेज तक सुगमता से जा रहे हैं। किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने में आसानी हो रही है। गांव में डिग्री कॉलेज और ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक घर को स्मारक के रूप में विकसित किए जाने से नई पीढ़ी को भी उनके बलिदान और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से जुड़ने का अवसर मिल रहा है।
एक पुल, जिसने बदल दी तीन पीढ़ियों की जिंदगी
खन्नौत नदी पर बना पक्का पुल आज सिर्फ एक सड़क संपर्क का साधन नहीं, बल्कि नवादा और आसपास के गांवों के लिए विकास की नई राह बन चुका है। जिस गांव की तीन पीढ़ियां हर बारिश में मुख्यधारा से कटने की मजबूरी झेलती रहीं, वहां अब आवागमन पूरे साल सुगम है।
शहीद ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि की यह कहानी सिर्फ एक पुल के निर्माण की कहानी नहीं है। यह उस सम्मान की कहानी है, जिसकी प्रतीक्षा शहीद की धरती ने दशकों तक की। आज नवादा की धरती न सिर्फ अपने अमर सपूत की शहादत की गवाही देती है, बल्कि विकास की नई तस्वीर के साथ आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति, साहस और बलिदान का संदेश भी दे रही है।






