बिहार की राजनीति इस वक्त सबसे निर्णायक दौर में है। विधानसभा चुनाव 2025 की आहट के साथ ही सियासी जमीन पर उथल-पुथल शुरू हो चुकी है। एक ओर महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को अपना मुख्यमंत्री चेहरा घोषित कर दिया है, तो दूसरी ओर एनडीए खेमे में योगी आदित्यनाथ की एंट्री ने विपक्षी खेमे में हलचल मचा दी है।महज दो रैलियों में ही जिस तरह योगी की मौजूदगी ने माहौल गरमाया है, वह इस बात का सबूत है कि उत्तर प्रदेश के बाद अब बिहार में भी “योगी फैक्टर” सियासी हवा बदल रहा है।बीजेपी के अंदर यह बात अब लगभग तय है कि आने वाले बिहार चुनाव में योगी आदित्यनाथ पार्टी के सबसे प्रभावशाली प्रचारक और चेहरा बनकर उभरेंगे।दरअसल, यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है — यह अमित शाह और आरएसएस की गहराई से बनाई गई रणनीति का हिस्सा है।अमित शाह अच्छी तरह जानते हैं कि बिहार में जातीय समीकरणों के पार जाने वाला चेहरा ही जनभावनाओं को जोड़ सकता है। योगी आदित्यनाथ वही चेहरा हैं — जो हिंदुत्व, प्रशासनिक सख्ती और जनसंपर्क — तीनों में दक्ष हैं।आरएसएस का भी यह मानना है कि योगी आदित्यनाथ का व्यक्तित्व संगठन और सरकार के बीच पुल का काम कर सकता है, जैसे उन्होंने उत्तर प्रदेश में किया।इसलिए बिहार में आरएसएस की शाखाओं और स्वयंसेवकों को निर्देश दिया गया है कि योगी की रैलियों और सभाओं को अधिकतम जनसंपर्क अभियान में बदला जाए। शाह, संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष और आरएसएस के क्षेत्र प्रचारक लगातार बिहार में इस रणनीति की मॉनिटरिंग कर रहे हैं।वहीं दूसरी ओर, जब अयोध्या में दीपावली का भव्य दीपोत्सव मनाया जा रहा था, तब यूपी की सियासत में एक नई अफवाह ने जोर पकड़ा।योगी आदित्यनाथ उस रात पूरी अयोध्या को रौशन कर रहे थे — लेकिन दोनों डिप्टी सीएम, केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक, कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे।विपक्ष और कुछ मीडिया संस्थानों ने तुरंत कहानी गढ़ी कि दोनों नेता योगी से नाराज हैं क्योंकि दीपोत्सव के अखबारी विज्ञापन में सिर्फ योगी, मोदी और दो मंत्री जयवीर सिंह और सूर्य प्रताप शाही की तस्वीरें थीं, डिप्टी सीएम की नहीं।
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चर्चाएं फैल गईं कि यूपी में बड़ा खेल होने वाला है। लेकिन सच्चाई कुछ और थी —यह न तो सत्ता संघर्ष था, न असहमति। दोनों डिप्टी सीएम ने बाद में साफ किया कि सरकार और पार्टी पूरी तरह एकजुट है, और यह सब विपक्षी प्रोपेगेंडा है।दरअसल, यह पूरा नैरेटिव एक सुनियोजित प्रयास था — योगी की बढ़ती लोकप्रियता को कमजोर करने का।क्योंकि जिस तरह बिहार में बीजेपी ने उन्हें मिशन का चेहरा बनाना शुरू किया, उसी के साथ योगी आदित्यनाथ विपक्ष के लिए एक राजनीतिक खतरा बन गए हैं।बीजेपी अब बिहार में डबल इंजन से आगे बढ़ चुकी है — अब यह ट्रिपल इंजन मिशन बन गया हैअमित शाह – रणनीतिक दिमागयोगी आदित्यनाथ – जनभावना का चेहरा,,,आरएसएस – संगठनात्मक जड़,,,इन तीनों की संयुक्त भूमिका बीजेपी के लिए चुनावी शक्ति का नया मॉडल बन रही है।अमित शाह जहां चुनावी प्रबंधन और बूथ स्ट्रक्चर को संभाल रहे हैं, वहीं आरएसएस “जमीनी कार्यकर्ताओं और वैचारिक मोर्चे” को मजबूती दे रहा है। और योगी आदित्यनाथ जनता के बीच बीजेपी के प्रभावशाली प्रचारक के तौर पर उतर रहे हैं।शाह की रणनीति साफ है —अगर बिहार में बीजेपी को नया उभार चाहिए, तो जनता के बीच वही चेहरा भेजो जो नारे नहीं, असर पैदा करे।महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करके एकजुटता का संदेश तो देने की कोशिश की, पर अंदरूनी असहमति बरकरार है।वहीं दूसरी ओर, योगी आदित्यनाथ के बिहार में बढ़ते प्रभाव ने विपक्ष की नींद उड़ा दी है। राजद सांसद मीसा भारती तक को यह कहना पड़ा योगी का बिहार में क्या काम?यह बयान ही बताता है कि विपक्ष की असली चिंता योगी की मौजूदगी है।क्योंकि योगी बिहार में सिर्फ एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि बीजेपी के वैचारिक ब्रांड के रूप में उतर रहे हैं — वह ब्रांड जो हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और सख्त प्रशासन के मिश्रण से बना है।अब इस पूरी खबर का निष्कर्ष क्या है तो वो भी आप जान लीजिये ,,,बिहार की सियासत में इस वक्त एक नया अध्याय लिखा जा रहा है —जहाँ नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय चेहरा हैं, वहीं योगी आदित्यनाथ बीजेपी के भावनात्मक चेहरा बनते जा रहे हैं।आरएसएस की संगठनात्मक ताकत, अमित शाह की रणनीतिक गहराई और योगी आदित्यनाथ की जनस्वीकार्यता — यह तिकड़ी अगर एक दिशा में काम करती है, तो 2025 का चुनाव बिहार की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।विपक्ष अब भी पूछ रहा है कि योगी बिहार में क्या करने आए हैं?लेकिन असली सवाल यह है — क्या बिहार में कोई ऐसा नेता बचा है जो योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता और प्रभाव का मुकाबला कर सके?





