योगी से केशव भिड़ने को तैयार! यूपी में होगा महासंग्राम! राजनाथ -शाह किसपर होंगे मेहरबान!

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    दोपहर की गर्म हवा में जब सीवान की पुलिस लाइन ग्राउंड में हजारों की भीड़ जय श्रीराम के नारे लगा रही थी तब मंच पर खड़ा एक चेहरा सबके बीच चर्चा का केंद्र बन चुका था।वह चेहरा था योगी आदित्यनाथ का ,वो नेता जिसे पार्टी का फायरब्रांड चेहरा कहा जाता है, और जिसके आने से चुनावी हवा का रुख बदल जाता है।लेकिन इस बार मामला सिर्फ़ रैली या भीड़ तक सीमित नहीं है।बिहार की रैलियों के पीछे लखनऊ की गहराती सियासी खींचतान छिपी है —जहां एक तरफ़ डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और अमित शाह का समीकरण नया रंग ले रहा है.वहीं दूसरी ओर योगी आदित्यनाथ के पीछे खड़ी दिख रही है राजनाथ सिंह और RSS की मजबूत दीवार।यानी बिहार का मंच, असल में बीजेपी के भीतर शक्ति-संतुलन की नई पटकथा बन रहा है।आज सीएम योगी तीन अहम जनसभाओं को संबोधित किये हैं पहली सुबह 11:30 बजे सिवान विधानसभा की पुलिस लाइन ग्राउंड में,दूसरी दोपहर 1 बजे वैशाली की लालगंज विधानसभा के ब्रह्मानंद पंजियार कॉमर्स कॉलेज मैदान में,और तीसरी भोजपुर की अगिआंव विधानसभा के गड़हनी में।जहां भी योगी की रैली तय होती है, वहां प्रत्याशियों की मांग अपने आप बढ़ जाती है।क्योंकि यह सबको मालूम है — योगी जहां बोलते हैं, वहां लहर बनती है।उनका भयमुक्त, निष्पक्ष और पारदर्शी शासन’ का नारा अब बिहार के मंच से गूंज रहा है,और लोग यूपी मॉडल को बिहार के भविष्य से जोड़कर देखने लगे हैं।योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषणों में साफ संदेश दिया कि उत्तर प्रदेश में जो हुआ, वह बिहार में भी हो सकता है।उन्होंने कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार पर सर्जिकल स्ट्राइक और गरीबों के सशक्तिकरण की चर्चा की।इसके आलावा योगी आज एक जनसभा को संबोधित करते हुये कहा कि एक खानदानी माफिया बिहार में फिर से कब्जा करना चाहता है.. यूपी में हमने बुलडोजर से रौंद रौंद कर कचूमड़ निकाल कर यूपी की धरती से जहन्नुम के रस्ते खोल दिए है..और वही बिहार में होगा माफिया बिहार छोड़कर जहनुम चले जायेंगे ,यानी कि बिहार में भी बुलडोजर ब्रांड का प्रचार अब जोर पकड़ चुका है।और बीजेपी इसे अपने सबसे बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है।

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    पार्टी के रणनीतिकारों को भरोसा है कि योगी की भीड़ से निकलने वाला संदेश सीधे मतपेटी तक पहुंचेगा और माहौल को एनडीए के पक्ष में मोड़ देगा।लेकिन इन जनसभाओं की चमक के पीछे लखनऊ में एक और मोर्चा सुलग रहा है।कुछ दिनों पहले जब योगी ने गन्ना किसानों का समर्थन मूल्य ₹30 प्रति क्विंटल बढ़ाया,तो इस फैसले की पूरे यूपी में तारीफ हुई — लेकिन केशव प्रसाद मौर्य ने अपने ट्वीट में योगी का नाम तक नहीं लिया।उन्होंने पूरा श्रेय मोदी सरकार को दिया।राजनीतिक हलकों में यह चर्चा फैल गई कि केशव नहीं चाहते थे कि योगी बिहार के चुनावी मैदान में उतरें —पर दिल्ली के नेतृत्व को मालूम था कि योगी का जनाधार,उसका प्रभाव और उनका फायरब्रांड करिश्मा पार्टी की असली ताकत है।इसीलिए हर विरोध के बावजूद योगी को बिहार भेजा गया —और अब उनका मंच पर लौटना, कुछ नेताओं के लिए सियासी झटका बन चुका है।योगी और केशव की दूरी कोई नई नहीं है।2017 में जब यूपी में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत हुई,तब केशव प्रसाद मौर्य मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार थे।लेकिन आखिरी वक्त पर बीजेपी ने योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाया और केशव को केवल डिप्टी सीएम की कुर्सी दी।2022 में उम्मीद थी कि केशव को बड़ा मौका मिलेगा —पर हुआ उल्टा। योगी दोबारा सीएम बने, और केशव अपनी सीट तक हार गए।तभी से दोनों नेताओं के बीच मौन युद्ध जारी है।अब बीजेपी के गलियारों में चर्चा है कि पार्टी दो स्पष्ट ध्रुवों में बंट चुकी है।एक ओर अमित शाह और केशव प्रसाद मौर्य,जो संगठन की प्राथमिकता की बात करते हैं,और दूसरी ओर योगी आदित्यनाथ,जिन्हें राजनाथ सिंह और RSS का वैचारिक समर्थन प्राप्त है।हाल ही में अमित शाह जब लखनऊ आए थे,उन्होंने योगी के साथ मंच साँझा किया था ,लेकिन सार्वजनिक मंच से केशव को मित्र कहा। और उसके कुछ दिन बाद केशव ने उन्हें गुरु बताकर संबंध और पुख्ता कर दिए।यानी अब भाजपा के भीतर एक नई सियासी धारा बह रही है —जहां केंद्र और प्रदेश के नेतृत्व के बीच संवाद कम, रणनीति ज़्यादा दिखती है।इन सबके बावजूद, योगी की बिहार एंट्री बीजेपी के लिए बूस्टर डोज़ साबित हो रही है।उनकी रैलियों में जोश, नारों में ऊर्जा और भाषणों में आत्मविश्वास —सब मिलकर जनता को जोड़ रहे हैं।उनकी लोकप्रियता केवल यूपी तक सीमित नहीं रही;वह अब एनडीए का‘पेन -इंडिया हिंदुत्व चेहरा बन चुके हैं।

    अब इस पूरी खबर का निष्कर्ष क्या है तो वो भी आप जान लीजिये आज बिहार की धरती पर योगी आदित्यनाथ की रैलियाँ केवल भीड़ नहीं जुटा रहीं,वे भाजपा की अंदरूनी राजनीति का संतुलन भी बदल रही हैं।क्योंकि सवाल अब सिर्फ़ यह नहीं कि बिहार में कौन जीतेगा —सवाल यह है कि बीजेपी के भीतर संगठन की जीत होगी या योगी ब्रांड की।अगर अमित शाह के साथ केशव का समीकरण और मजबूत हुआ,तो योगी की राह और कठिन हो सकती है।लेकिन अगर राजनाथ और RSS उनके साथ खड़े रहे,तो आने वाले दिनों में योगी की ताकत को कोई रोक नहीं पाएगा।राजनीति में कहते हैं जो जनता का दिल जीत ले, वही दिल्ली की कुर्सी हिला सकता है।और फिलहाल, बिहार के मैदान में जनता का दिल योगी के साथ धड़कता दिख रहा है।

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