Home Uttar Pradesh आजादी के 77 साल, सड़क खस्ताहाल! मुंह फेर रहे जनप्रतिनिधि और अधिकारी

आजादी के 77 साल, सड़क खस्ताहाल! मुंह फेर रहे जनप्रतिनिधि और अधिकारी

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  • आजादी के 77 साल बाद भी सड़क के बिना ज़िंदगी
  • हमीरपुर के बीहड़ों से विकास के दावों पर सीधा हमला

हमीरपुर: देश आज़ादी के 77 साल पूरे कर चुका है। सरकारें बदलती रहीं, नारे बदलते रहे डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन, गड्ढा मुक्त सड़कें लेकिन उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के बीहड़ों में बसे गांवों की हकीकत इन नारों को आईना दिखा रही है। यहां विकास आज भी कागज़ों तक सीमित है और ज़मीनी सच्चाई यह है कि जिला मुख्यालय से महज 3 किलोमीटर दूर चंदूपुर वार्ड और उससे जुड़े गांव आज भी पक्की सड़क के इंतज़ार में हैं।

यह कोई छोटा मुद्दा नहीं है। चंदूपुर वार्ड से जुड़े लगभग 15 गांव और मजरे, जिनकी आबादी एक लाख से अधिक है, आज भी मिट्टी, धूल और कीचड़ भरी सड़क से गुजरने को मजबूर हैं। आज़ादी के बाद से अब तक एक भी बार स्थायी सड़क निर्माण नहीं हो सका। यह आंकड़ा अपने आप में सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

  • शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सब पर चोट
  • सड़क न होने का मतलब सिर्फ आवागमन की परेशानी नहीं है। इसका सीधा असर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर पड़ता है। बरसात के मौसम में जब सड़क पर कई फीट तक पानी और कीचड़ भर जाता है, तब न एंबुलेंस चल पाती है, न स्कूल जाने वाले बच्चे पहुंच पाते हैं। हालात इतने भयावह हैं कि गंभीर रूप से बीमार लोगों को खाट पर लादकर कीचड़ के बीच से अस्पताल ले जाना पड़ता है। यह दृश्य किसी आपदा क्षेत्र का नहीं, बल्कि एक “विकासशील भारत” का कड़वा सच है।
  • 77 साल में सिर्फ आश्वासन, विकास कागजों पर

स्थानीय लोगों के अनुसार, मंत्रियों से लेकर सांसद और विधायक तक, सभी से कई बार सड़क बनवाने की गुहार लगाई गई। हर बार आश्वासन मिला, लेकिन नतीजा वही रहा “ढाक के तीन पात”। आखिरकार थक-हारकर लोगों को हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर जिलाधिकारी कार्यालय में प्रदर्शन करना पड़ा। यह प्रदर्शन नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ जनता की मजबूरी की चीख है।

  • वन विभाग बना सबसे बड़ा रोड़ा

प्रशासनिक रिकॉर्ड के मुताबिक, यह सड़क वन विभाग की भूमि बताकर वर्षों से अटकी हुई है। हर योजना पर वन विभाग आपत्ति दर्ज कर देता है और निर्माण फाइलों में ही दम तोड़ देता है। सवाल यह है कि जब एक लाख से अधिक लोगों की जीवनरेखा दांव पर हो, तो क्या कोई वैकल्पिक रास्ता, भूमि हस्तांतरण या विशेष अनुमति नहीं निकाली जा सकती? या फिर विभागीय जिद के आगे जनता की जिंदगी की कोई कीमत नहीं?

  • परिसीमन हुआ, सड़क नहीं बनी

नए परिसीमन में ब्रह्मा का डेरा जैसे इलाके हमीरपुर जिला मुख्यालय के वार्ड चंदूपुर में जोड़ दिए गए, लेकिन उन्हें जोड़ने वाली सड़क के हालात आज भी जस के तस हैं। अब जनप्रतिनिधि वन विभाग की लापरवाही का हवाला देकर खुद को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि जनता साफ सवाल पूछ रही है जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

  • बुलेट ट्रेन बनाम बीहड़ की सड़क

21वीं सदी में जब देश बुलेट ट्रेन चलाने की तैयारी कर रहा है, तब हमीरपुर के बीहड़ों की यह सड़क सरकारी योजनाओं पर करारा तमाचा है। गड्ढा मुक्त सड़क, हर गांव को मुख्यालय से जोड़ने जैसे दावे यहां पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं। डिजिटल इंडिया की बात करने वाले सिस्टम को यह बताना होगा कि बिना सड़क के डिजिटल विकास किसके लिए है?

  • अब सवाल नहीं, अब जवाब जरूरी

यह मामला सिर्फ हमीरपुर का नहीं, बल्कि नीतिगत संवेदनहीनता का उदाहरण है। यदि जिला मुख्यालय से 3 किलोमीटर दूर बसे गांवों को 77 साल में सड़क नहीं मिल सकी, तो दूर-दराज़ इलाकों की कल्पना ही डरावनी है। अब समय आ गया है कि सरकार और प्रशासन स्पष्ट समय-सीमा, ठोस योजना और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करें। वरना चंदूपुर और उससे जुड़े गांव आने वाले वर्षों में भी यही सवाल पूछते रहेंगे क्या? आज़ादी सिर्फ शहरों के लिए थी, और गांवों के हिस्से सिर्फ इंतज़ार आया?

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