बिहार में नई सरकार के गठन के बाद अब सबसे बड़ी नजर बहुप्रतीक्षित कैबिनेट विस्तार पर टिकी हुई है। राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है और सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल का विस्तार मई के पहले सप्ताह के बाद कभी भी किया जा सकता है। माना जा रहा है कि 6 मई के बाद इस संबंध में आधिकारिक घोषणा हो सकती है, जिससे राज्य की राजनीति में नई हलचल देखने को मिलेगी।
हाल ही में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने दिल्ली दौरे के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ अहम बैठक की थी। इस बैठक में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर मंथन हुआ और संभावित मंत्रियों की सूची को अंतिम रूप दिया गया। जानकारी के अनुसार, इस बार कैबिनेट में संतुलन और प्रभावशीलता दोनों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
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सूत्रों का कहना है कि इस विस्तार में भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के बीच विभागों के बंटवारे को लेकर सहमति बन चुकी है। साथ ही, नए और युवा चेहरों को मौका देने की रणनीति भी बनाई गई है, ताकि सरकार में नई ऊर्जा और गति लाई जा सके।
शपथ ग्रहण समारोह को भव्य बनाने की तैयारी भी जोरों पर है। इसके लिए पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान को चुना गया है, जहां बड़े स्तर पर मंच और सुरक्षा व्यवस्था की जा रही है। सुरक्षा कारणों से फिलहाल मैदान को आम लोगों के लिए अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है और चारों तरफ कड़े इंतजाम किए गए हैं। इसके अलावा राजधानी पटना में ट्रैफिक व्यवस्था में भी बदलाव की संभावना जताई जा रही है।
इस समारोह को और खास बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शामिल होने की भी चर्चा है। उनके अलावा एनडीए शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और कई वरिष्ठ नेता भी इस कार्यक्रम में शिरकत कर सकते हैं। इससे यह आयोजन केवल शपथ ग्रहण तक सीमित न रहकर एक बड़े राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है।
मंत्रिमंडल विस्तार में इस बार बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। करीब 30 से 40 प्रतिशत पुराने मंत्रियों को हटाकर नए चेहरों को मौका दिया जा सकता है। इसके साथ ही सामाजिक और जातीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए सहयोगी दलों को भी प्रतिनिधित्व देने की योजना है। इनमें लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा जैसे दल शामिल हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कैबिनेट विस्तार केवल सरकार के पुनर्गठन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए आने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए रणनीतिक संदेश देने की कोशिश भी की जा रही है। नए मंत्रियों की नियुक्ति और विभागों के पुनर्वितरण से यह स्पष्ट होगा कि सरकार किन प्राथमिकताओं पर आगे बढ़ना चाहती है।
कुल मिलाकर, बिहार का यह कैबिनेट विस्तार आने वाले समय की राजनीति को दिशा देने वाला साबित हो सकता है। अब सभी की नजर आधिकारिक घोषणा पर टिकी है, जो राज्य की सत्ता के अगले चरण की तस्वीर साफ करेगी।






