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प्रताप को ‘महाराणा’ बनने से पहले सौतेली मां का झेलना पड़ा विरोध, पढ़ें 20 मांओं के प्रतापी बेटे की अनसुनी कहानी

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राजस्थान मेवाड़ की धरती पर जन्में महाराणा प्रताप की जयंती पर उनके शौर्य और वीरगाथा की लोग चर्चा कर रहे है। महाराणा प्रताप की ओर से गुलामी स्वीकार ना करने की कहानी तो हर कोई जानता है, लेकिन उन्होंने जीवन में पहले भी कई संघर्षों पर जीत हासिल की, इसे लेकर पेश है

भगवान प्रजापत उदयपुर: वीर शिरोमणी महाराणा प्रताप का नाम सुनते ही मेवाडवासियों को इस बात का गर्व होता है कि वे उस जगह के रहने वाले है जहां पर प्रताप जैसे वीर योद्धा हुए थे, जिन्होंने कभी भी मुगलों की हार स्वीकार नहीं की। महाराणा प्रताप की जयंती अंग्रेजी महीने और विक्रम संवत के अनुसार अलग-अलग आती है इसलिए दोनों ही दिन कई कार्यक्रम होते है। मेवाड़ में महाराणा प्रताप जयंती के उपलक्ष्य में होने वाले सभी कार्यक्रम उनकी जन्मतिथि के अनुसार होते है। ऐसे में उदयपुर में 2 जून को बडे़ हर्षोल्लास के साथ महाराणा प्रताप जयंती मनाई जाएगी। इसके तहत विशाल शोभायात्रा के साथ विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। महाराणा प्रताप के शौर्य और वीरता के बारे में आप सभी जानते है, लेकिन उनके निजी जीवन के बारे में बहुत कम ही लोग जानते होगें।

20 मांओं के प्रतापी पुत्र थे महाराणा
महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था, उनके 24 भाई व 20 बहनें थी। वे एक तरह से 20 मांओं के प्रतापी पुत्र थे। महाराणा प्रताप का कद 7 फुट 5 इंच का था। प्रताप के भाले का वजन 80 किलो, उनकी दो तलवारें जिनका वजन 208 किलोग्राम और कवच लगभग 72 किलोग्राम का था। कहा जाता है कि उनकी तलवार के एक ही वार से घोड़े के दो टुकड़े हो जाया करते थे। वे करीब 3 क्विंटल बोझ के साथ युद्ध में जाया करते थे और युद्ध के मैदान में अच्छे अच्छों के छक्के छुड़ा देते थे।

प्रताप को करनी पड़ी थी 20 शादियां
राजनैतिक कारणों के वजह से महाराणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल 11 शादियां की थीं। महाराणा प्रताप के 17 बेटे और 5 बेटियां थीं। महारानी अजाब्दे से पैदा हुए अमर सिंह उनके उत्तराधिकारी बने और प्रताप के बाद उन्हें राजगद्दी को संभाला।

प्रताप को राज सिंहासन के लिए झेलना पड़ा मां का विरोध
बताया जाता है कि प्रताप के राज सिंहासन हासिल करने की कहानी भी काफी संघर्षपूर्ण रही है। महाराणा प्रताप को गद्दी हासिल करने में अपने सौतेली माता रानी धीरबाई के विरोध का सामना करना पड़ा। वे चाहती थीं कि गद्दी उनके बेटे कुंवर जगमाल को मिले, लेकिन राज्य के मंत्री और दरबारी महाराणा प्रताप के पक्ष में होने से अंत में प्रताप को ही महाराणा घोषित करना पड़ा। इसके बाद जगमाल ने गुस्से में मेवाड़ छोड़ दिया। साथ ही अजमेर आकर अकबर से संधि कर ली, जिसके फलस्वरूप अकबर ने उन्हें जहाजपुर की जागीर उपहार स्वरूप दे दी।

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महाराणा प्रताप ने कभी भी स्वीकार नहीं की गुलामी
महाराणा प्रताप ने जिंदगी में कभी किसी गुलामी स्वीकार नहीं की। जबकि मेवाड़ को जीतने के लिए अकबर ने सभी तरह के प्रयास किए। उन्होंने कभी मुगलों के किसी भी तरह के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और मेवाड़ से कई गुना ताकतवर मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष करते रहे। अकबर ने महाराणा प्रताप के पास 6 प्रस्ताव भेजे, जिससे युद्ध को शांतिपूर्ण तरीके से खत्म किया जा सके, लेकिन महाराणा ने अकबर की अधीनता में मेवाड़ का शासन स्वीकार नहीं किया। इसके बाद अकबर ने मानसिंह और असफ खान को एक विशाल सेना के साथ महाराणा प्रताप से युद्ध के लिए भेजा, जो महाराणा की सेना से कई गुना ज्यादा थी।

18 जून 1576 को हुआ था हल्दी घाटी
महाराणा प्रताप ने अकबर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया ,तो अकबर में मेवाड पर आक्रमण कर दिया। 18 जून, 1576 ई. को हुए हल्दीघाटी युद्ध में करीब 20,000 राजपूतों को साथ लेकर महाराणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80,000 से अधिक की सेना का सामना किया। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें 17,000 लोग मारे गए थे। इसके बावजूद यह युद्ध अनिर्णायक रहा था। अकबर ने अंत तक मेवाड पर विजय पाने की पूरी कोशिश की, लेकिन महाराणा प्रताप के जिद्द के आगे अकबर का सपना कभी पूरा नहीं हो पाया।

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