असम विधानसभा में पेश किए गए समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक को लेकर सियासत तेज हो गई है। Asaduddin Owaisi ने इस बिल का कड़ा विरोध करते हुए इसे मुसलमानों पर हिंदू कानून थोपने की “परोक्ष कोशिश” करार दिया है। AIMIM प्रमुख ओवैसी ने आरोप लगाया कि यह विधेयक समानता के नाम पर मुस्लिम समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता को कमजोर करने का प्रयास है।
दरअसल, असम सरकार ने सोमवार को विधानसभा में UCC से जुड़ा विधेयक पेश किया। इस बिल में बहुविवाह पर रोक लगाने, विवाह और तलाक के पंजीकरण को अनिवार्य बनाने तथा लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन का प्रावधान शामिल है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह कानून राज्य के अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों पर लागू नहीं होगा।
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इस विधेयक को लेकर Himanta Biswa Sarma ने कहा कि इसका उद्देश्य विवाह, तलाक, विरासत और सह-जीवन संबंधी कानूनों को सरल और एक समान बनाना है। मुख्यमंत्री के मुताबिक, विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण महिलाओं के अधिकारों की रक्षा, भरण-पोषण और संपत्ति से जुड़े विवादों को कम करने में मदद करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार उत्तराधिकार कानूनों को आधुनिक बनाकर संपत्ति के निष्पक्ष वितरण की दिशा में कदम उठा रही है।
लेकिन ओवैसी ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यह “समान नागरिक संहिता” वास्तव में समान नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब जनजातीय समुदायों को इस कानून से बाहर रखा गया है, तो फिर इसे “यूनिफॉर्म” कैसे कहा जा सकता है। ओवैसी ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 29 सभी समुदायों को अपनी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा का अधिकार देता है, लेकिन इस बिल में केवल जनजातीय समुदायों की स्वायत्तता को सुरक्षित रखा गया है, जबकि मुसलमानों को तथाकथित समान नियमों का पालन करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि उत्तराधिकार और विरासत के मामलों में हिंदू सिद्धांतों को लागू करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि इस्लामी कानून में कोई व्यक्ति अपनी पूरी संपत्ति सिर्फ एक बेटे को नहीं दे सकता और न ही बेटी को विरासत से पूरी तरह वंचित कर सकता है। लेकिन नए प्रस्तावित कानून के तहत वसीयत के जरिए बेटियों को उनके अधिकार से वंचित किए जाने की संभावना बढ़ जाएगी।
AIMIM प्रमुख ने यह भी कहा कि संविधान सभा ने कभी अनिवार्य UCC की परिकल्पना नहीं की थी। उनके मुताबिक, यह कानून सामाजिक सहमति के बजाय राजनीतिक एजेंडे के तहत लाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार “समानता” के नाम पर धार्मिक विविधता को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
वहीं भाजपा और असम सरकार का कहना है कि UCC महिलाओं को समान अधिकार देने और कानूनी प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाने के लिए जरूरी है। सरकार का दावा है कि इससे विवाह, तलाक और संपत्ति विवादों में कानूनी स्पष्टता आएगी और महिलाओं को अधिक सुरक्षा मिलेगी।
असम में पेश किए गए इस विधेयक को लेकर अब राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर विधानसभा के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी बड़ा टकराव देखने को मिल सकता है।



