पटना। बिहार में सरकारी आवास को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और मुख्यमंत्री पद छोड़ चुके नेताओं को आवंटित सरकारी बंगलों को लेकर जारी विवाद के बीच शिवसेना (यूबीटी) ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि सभी नेताओं को नियमों और पात्रता के अनुसार सरकारी आवास का उपयोग करना चाहिए। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आनंद दुबे ने कहा कि सरकारी बंगलों का रखरखाव जनता के पैसे से होता है, इसलिए पद छोड़ने के बाद किसी भी व्यक्ति को निर्धारित नियमों का पालन करना चाहिए।
पटना स्थित 10 सर्कुलर रोड के सरकारी आवास को लेकर चल रही राजनीतिक बहस और जनशक्ति जनता दल के संस्थापक तेज प्रताप यादव के हालिया बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए आनंद दुबे ने कहा कि यह बहस नहीं होनी चाहिए कि पहले कौन बंगला खाली करेगा। उन्होंने कहा कि मुद्दा केवल नियमों के पालन का है और सभी नेताओं को समान मानकों पर परखा जाना चाहिए।
शिवसेना (यूबीटी) के प्रवक्ता ने कहा कि वर्तमान में न तो राबड़ी देवी मुख्यमंत्री हैं और न ही नीतीश कुमार उस पद पर हैं, जिसके आधार पर उन्हें संबंधित सरकारी आवास आवंटित किया गया था। ऐसे में दोनों नेताओं को अपनी वर्तमान पात्रता के अनुरूप आवास ग्रहण करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि एक पुत्र होने के नाते तेज प्रताप यादव का अपनी मां के समर्थन में खड़ा होना स्वाभाविक है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रशासनिक मर्यादा के लिए नियमों का पालन जरूरी है।
वहीं इस मुद्दे पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने सरकार पर पलटवार किया है। पार्टी के प्रधान महासचिव अब्दुल बारी सिद्दीकी ने मुख्यमंत्री आवास को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि बिहार जैसे आर्थिक रूप से कमजोर राज्य में मुख्यमंत्री का सरकारी आवास अत्यंत भव्य और विशाल स्वरूप ले चुका है। उन्होंने दावा किया कि वर्तमान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का आवास क्षेत्रफल और सुविधाओं के लिहाज से बेहद बड़ा है।
सिद्दीकी ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने पूर्व में उपमुख्यमंत्री के लिए आवंटित सरकारी आवास को भी अपने परिसर में शामिल कर लिया है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री का सरकारी आवास अब काफी विस्तृत क्षेत्र में फैल चुका है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि सरकार नियमों और प्रक्रियाओं को लेकर इतनी गंभीर है, तो उपमुख्यमंत्री स्तर के अन्य नेताओं को उनके निर्धारित आवासों में स्थानांतरित क्यों नहीं किया जा रहा।
राजद नेता ने कहा कि लोकतांत्रिक परंपराओं और राजनीतिक शिष्टाचार का पालन सभी दलों और नेताओं को करना चाहिए। उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि राजनीतिक दुर्भावना के तहत कार्रवाई की जाती है, तो उनकी पार्टी भी अपने स्तर पर उचित निर्णय लेने को बाध्य होगी।
सरकारी आवास को लेकर छिड़ी यह बहस अब केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और विपक्ष इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या आवास आवंटन से जुड़े नियमों को लेकर कोई नया निर्णय सामने आता है।






