विकास किसी भी क्षेत्र की प्रगति का आधार होता है, लेकिन जब विकास की योजनाएं इतिहास और विरासत के अस्तित्व पर सवाल खड़े करने लगें, तो बहस जरूरी हो जाती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जनपद में इन दिनों कुछ ऐसा ही मामला सामने आया है, जहां एक ओर सड़क चौड़ीकरण के जरिए विकास की नई राह तैयार की जा रही है, तो दूसरी ओर प्रदेश के पहले आदर्श गांव की पहचान मानी जाने वाली ऐतिहासिक धरोहरें खतरे में पड़ गई हैं। मामला छपरौली-बड़ौत मार्ग के चौड़ीकरण से जुड़ा है।
लोक निर्माण विभाग हरियाणा सीमा से बड़ौत तक लगभग 12 किलोमीटर लंबे मार्ग को चौड़ा करने जा रहा है। इस परियोजना से उत्तर प्रदेश और हरियाणा के बीच यातायात और व्यापारिक गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद है। विभाग ने निर्माण की तैयारियां शुरू कर दी हैं और सड़क की जद में आने वाले निर्माणों को नोटिस भी जारी किए जा चुके हैं।
इस परियोजना से आधा दर्जन गांव प्रभावित होंगे, लेकिन सबसे ज्यादा चिंता आदर्श नंगला गांव के लोगों को है। ग्रामीण विकास कार्यों के विरोध में नहीं हैं, बल्कि वे अपनी उस ऐतिहासिक पहचान को बचाने की मांग कर रहे हैं जिसने इस गांव को राष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान दिलाई।
आदर्श नंगला को देश के पहले आदर्श गांवों में शामिल होने का गौरव प्राप्त है। आजादी के बाद जब अधिकांश गांव बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब यहां सार्वजनिक शौचालय, बालिका छात्रावास, स्वच्छ पेयजल के लिए ढके हुए कुएं और सुनियोजित जल निकासी जैसी व्यवस्थाएं मौजूद थीं। यही वजह रही कि तत्कालीन मुख्यमंत्री बनारसी दास गुप्त ने इस गांव को “आदर्श गांव” का दर्जा दिया था और तभी से ख्वाजा नंगला, आदर्श नंगला के नाम से जाना जाने लगा। गांव की पहचान बने सात भव्य प्रवेश द्वार, जिन्हें 1950 और 1960 के दशक में देश के महान महापुरुषों के नाम पर बनाया गया था, आज भी उस गौरवशाली इतिहास की गवाही देते हैं। लेकिन अब सड़क चौड़ीकरण की जद में यही सातों द्वार आ गए हैं।
ग्रामीणों को आशंका है कि यदि कोई वैकल्पिक समाधान नहीं निकाला गया तो गांव की ये ऐतिहासिक धरोहरें हमेशा के लिए समाप्त हो सकती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास और सड़क निर्माण का पूरा समर्थन करते हैं, लेकिन विकास की कीमत पर अपनी विरासत को मिटने नहीं देना चाहते। उनकी मांग है कि प्रशासन और लोक निर्माण विभाग ऐसा रास्ता निकाले जिससे सड़क चौड़ीकरण का काम भी हो और गांव की ऐतिहासिक पहचान भी सुरक्षित रह सके। अब बड़ा सवाल यही है कि विकास और विरासत के बीच संतुलन कैसे बनेगा? क्या प्रशासन आदर्श नंगला की ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने का कोई रास्ता निकालेगा, या फिर विकास की नई सड़क पर इतिहास की ये निशानियां हमेशा के लिए मिट जाएंगी?






