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फंस गये मोहन यादव , रातों रात बने स्टार ! इस्तीफा की मांग तेज !

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“ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा… कोई भ्रष्टाचारि हमारे बगल बैठकर हमारा ताप सहन नहीं कर सकता ये बातें जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कही थी तब देश वाशियो ने बैठकर खूब तालियां बजायी थी ? और सोचा था कि भईया pm हो तो मोदी जैंसा ,,क्योकि भगवान राम की दरबार की तरह मोदी जी के साथ भी ईमानदारों की फौज है ,,और अब इसी कड़ी में मोदी शाह के सबसे प्यारे दुलारे मोहन यादव ने ईमानदारी के मामले में कमाल कर दिया है

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अब सवाल सीधे मोदी-शाह के भरोसेमंद मुख्यमंत्री मोहन यादव पर उठ रहे हैं। दो साल में 137 प्लॉट, 168 एकड़ जमीन, करीब 45 करोड़ रुपये के सौदे और वो भी ऐसे इलाकों में जहां सरकार खुद सड़कें, मास्टर प्लान और विकास परियोजनाएं लेकर आने वाली थी। आखिर ये सिर्फ किस्मत का खेल है, पुराना कारोबार है या फिर सत्ता और संपत्ति की ऐसी क्रोनोलॉजी जिस पर जवाब देना जरूरी हो गया है? इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद मध्य प्रदेश की राजनीति में भूचाल है, विपक्ष इस्तीफा मांग रहा है और मुख्यमंत्री कार्यालय की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। आज पूरी कहानी, बिना किसी पक्ष के, सिर्फ उन सवालों के साथ जो देश का आम आदमी पूछ रहा है।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश से कहा था कि “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा।” लेकिन अब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके परिवार से जुड़ी जमीन खरीद के आरोपों ने राजनीतिक गलियारों में बड़ा बवाल खड़ा कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि मुख्यमंत्री के परिवार ने उन्हीं इलाकों में बड़े पैमाने पर जमीन खरीदी जहां आने वाले समय में सरकार की विकास परियोजनाएं प्रस्तावित थीं। हालांकि अभी तक किसी जांच एजेंसी या अदालत ने किसी तरह की अवैधता साबित नहीं की है और मुख्यमंत्री कार्यालय की तरफ से भी विस्तृत जवाब सामने नहीं आया है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने से पहले उनके परिवार और उनसे जुड़े लोगों के पास करीब 179 एकड़ जमीन थी। लेकिन 13 दिसंबर 2023 को मुख्यमंत्री बनने के बाद अगले दो वर्षों में परिवार और उससे जुड़ी कंपनियों के जरिए 137 प्लॉट और लगभग 168 एकड़ अतिरिक्त जमीन खरीदे जाने का दावा किया गया है। इन जमीनों की कुल कीमत लगभग 45 करोड़ रुपये बताई गई है। इस तरह कुल जमीन होल्डिंग बढ़कर करीब 335 एकड़ तक पहुंचने का दावा किया गया है। रिपोर्ट में जिन लोगों के नाम का उल्लेख किया गया है, उनमें मुख्यमंत्री की पत्नी सीमा यादव, बेटे वैभव यादव की पत्नी शालिनी यादव, भाई नंदलाल यादव, भाई नारायण यादव, उनकी पत्नी रेखा यादव, भतीजे अभय यादव, चचेरे भाई गोविंद यादव और नीलेश यादव के नाम शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार परिवार से जुड़ी चार रियल एस्टेट कंपनियों के माध्यम से भी जमीनों की खरीद हुई, जिनमें श्री सिद्धि विनायक देवगंस प्राइवेट लिमिटेड का नाम प्रमुख रूप से सामने आया है। मुख्यमंत्री के समर्थकों और उनके करीबी लोगों का कहना है कि यह कोई रातोंरात खड़ा किया गया कारोबार नहीं है। उनका दावा है कि परिवार कई वर्षों से रियल एस्टेट और जमीन के कारोबार से जुड़ा हुआ है। इसलिए हर खरीद को मुख्यमंत्री पद से जोड़ना गलत होगा। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद खरीदारी की रफ्तार इतनी तेज क्यों हो गई? इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद खरीदी गई करीब 168 एकड़ जमीन में से लगभग 111 एकड़ जमीन उन क्षेत्रों में स्थित है जहां सरकार की सड़क और विकास परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। रिपोर्ट में उज्जैन-इंदौर मार्ग, उज्जैन-नागदा मार्ग, उज्जैन-बदनगर मार्ग और पांड्याखेड़ी जैसे इलाकों का जिक्र किया गया है।
पांड्याखेड़ी इलाके का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक परिवार से जुड़े लोगों ने यहां लगभग 18 एकड़ जमीन खरीदी, जिसे बाद में मास्टर प्लान 2035 के तहत कृषि भूमि से बदलकर रिहायशी और व्यावसायिक उपयोग के लिए प्रस्तावित किया गया। विपक्ष यहीं से सवाल उठा रहा है कि क्या यह केवल संयोग है कि जिन इलाकों में सरकारी विकास होना था, उन्हीं क्षेत्रों में मुख्यमंत्री के परिवार की जमीन भी दिखाई दे रही है? हालांकि बचाव पक्ष का कहना है कि जिन परियोजनाओं का जिक्र किया जा रहा है, उनकी जानकारी कोई गोपनीय नहीं थी। कई योजनाएं 2019-20 से ही सार्वजनिक दस्तावेजों और मास्टर प्लान का हिस्सा थीं। इसलिए अंदरूनी जानकारी का इस्तेमाल करने का आरोप साबित नहीं होता। अभी तक ऐसा कोई सार्वजनिक दस्तावेज, ईमेल, गवाह या प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है जिससे यह साबित हो सके कि मुख्यमंत्री या उनके परिवार ने गोपनीय सरकारी जानकारी का फायदा उठाया। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि जमीन खरीद के बाद कुछ जगहों पर विकास परियोजनाएं और हाउसिंग प्रोजेक्ट शुरू किए गए। रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री के चचेरे भाई गोविंद यादव ने कुछ इलाकों में जमीन को बिल्डरों के साथ रेवेन्यू शेयर मॉडल पर विकसित किया। वहीं नीलेश यादव द्वारा कई हाउसिंग प्रोजेक्ट रेरा में पंजीकृत कराए जाने का भी जिक्र किया गया है। विपक्ष का कहना है कि अगर सरकार सड़क बनाती है, विकास करती है और उसी विकास से मुख्यमंत्री के परिवार को आर्थिक फायदा मिलता है तो यह हितों के टकराव यानी Conflict of Interest का मामला बनता है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी नेताओं ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के इस्तीफे की मांग की है और पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग उठाई है।

हालांकि मुख्यमंत्री के समर्थक इसे राजनीतिक साजिश भी बता रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि मध्य प्रदेश बीजेपी के भीतर अलग-अलग गुटों के बीच चल रही खींचतान के कारण यह मामला सामने आया है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि क्या यह सिर्फ कांग्रेस बनाम बीजेपी का मामला है या फिर बीजेपी के अंदर की राजनीति भी इसके पीछे काम कर रही है। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी तक न तो किसी अदालत ने और न ही किसी जांच एजेंसी ने इन आरोपों की पुष्टि की है। इसलिए इन दावों को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी सच है कि जब सवाल मुख्यमंत्री और उनके परिवार से जुड़े हों तो पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच की मांग भी स्वाभाविक मानी जाती है। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या यह वर्षों पुराने कारोबार का सामान्य विस्तार है? क्या यह महज एक संयोग है? या फिर सत्ता और संपत्ति के बीच ऐसी क्रोनोलॉजी है जिसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है? इन सवालों के जवाब आने वाले समय और जांच प्रक्रिया से मिलेंगे। लेकिन फिलहाल मध्य प्रदेश की राजनीति में जमीन का यह मामला सिर्फ एक विवाद नहीं, बल्कि भरोसे, पारदर्शिता और राजनीतिक नैतिकता की परीक्षा बन गया है।