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राम मंदिर चोरी योगी नाराज क्या चम्पत पर इस्तीफा देने के बाद गिरेगा गाज

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क्या अयोध्या के राम मंदिर में हुई चोरी के बहाने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कुर्सी हिलाने की बहुत बड़ी साजिश रची जा रही है? आखिर वो कौन सी महाशक्ति है, जिसके इशारे पर राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और अनिल मिश्रा पर FIR दर्ज नहीं हुई? क्या दिल्ली और नागपुर यानी RSS मुख्यालय से कोई ऐसा अदृश्य दबाव है, जिसके आगे पूरी व्यवस्था नतमस्तक है? सियासत के गलियारों में सबसे बड़ा सवाल गूंज रहा है—जिस राम मंदिर के शिलान्यास से लेकर प्राण-प्रतिष्ठा तक का पूरा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद लिया, जिस धर्मध्वजा को फहराकर दुनिया को संदेश दिया गया, आज उसी राम मंदिर के खजाने में जब सेंधमारी हुई, तो दिल्ली से लेकर नागपुर तक चुप्पी क्यों छाई है? आखिर पीएम मोदी इस चोरी की नैतिक ज़िम्मेदारी क्यों नहीं ले रहे? और सबसे बड़ी बात… चोरी की ट्रस्ट के बड़े चेहरों ने, लेकिन विपक्ष के निशाने पर सिर्फ और सिर्फ योगी आदित्यनाथ क्यों हैं?” “यह हम नहीं कह रहे, बल्कि उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक के सियासी समीकरण इस बात की गवाही दे रहे हैं।

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सबसे पहले यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर बम फोड़ा और साफ कहा कि—योगी आदित्यनाथ को कुर्सी से हटाने की बहुत बड़ी अंदरूनी साजिश चल रही है। पहले मध्य प्रदेश के मोहन यादव हटाए जाएंगे, फिर राजस्थान के भजनलाल शर्मा और फिर नंबर आएगा योगी आदित्यनाथ का। बात यहीं नहीं रुकी! दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी खुलकर मोर्चा संभाल लिया। केजरीवाल ने साफ शब्दों में कहा कि—राम विरोधी और चंदा चोर मिलकर योगी को कुर्सी से हटाना चाहते हैं, योगी जी को इन अपराधियों को सीधे फांसी की सजा देनी चाहिए और इस लड़ाई में हम सब योगी के साथ हैं। अब सवाल यह उठता है कि जो राम मंदिर ट्रस्ट सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों पर बना, जिसमें गृह मंत्री अमित शाह और पीएम मोदी का मार्गदर्शन था, जहां वीएचपी और आरएसएस के बड़े-बड़े दिग्गजों को बिठाया गया… वहां कोई गड़बड़ होती है, तो ठीकरा अकेले योगी आदित्यनाथ के सिर पर क्यों फोड़ा जा रहा है?” आइए अब आपको बताते हैं कि अयोध्या में उस दिन हुआ क्या और कैसे इस मामले को दबाने की कोशिश की गई। जब शुरुआत में दान चोरी की खबरें आईं, तो ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने सीना तानकर कहा—ऐसी कोई चोरी नहीं हुई, सब अफवाह है। लेकिन सच को कब तक छुपाया जाता? कुछ ही घंटों में चोरी की बात सच साबित हो गई। हिंदू संगठन सड़कों पर उतर आए, अखिलेश यादव ने घेराबंदी शुरू की, और आनन-फानन में योगी आदित्यनाथ ने SIT का गठन कर दिया। SIT ने जांच की, रिपोर्ट आई, और 8 लोगों पर FIR दर्ज हो गई। लेकिन चौंकाने वाली बात देखिए! इस FIR से दो सबसे बड़े नाम गायब थे—चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा!

अनिल मिश्रा जिनकी ज़िम्मेदारी कैश काउंटिंग हॉल की कमान संभालना, चढ़ावे की गिनती करना और बैंकिंग व्यवस्था देखना था। जिनसे समिति ने 4 घंटे कड़ी पूछताछ की। चोरी चंपत राय के ड्राइवर के नेटवर्क से हुई, कैश काउंटिंग अनिल मिश्रा की नाक के नीचे से हुई, जबकि चंपत राय ट्रस्ट के महासचिव थे जिनके नेतृत्व में जमीनों का सौदा हुवा ट्रस्ट के लिए ,,चम्पत पर आरोप है कि उन्होंने कम कीमत वाली जमीनों कई गुना ज्यादा पैसा दिए इसके आलावा केस रुपये को लेकर सवालिया निशान खड़े हो रहे है ,,,संजय सिंह sit को बाकायदा जमीनों में हुई हेराफेरी के पेपर सौप चुके है ,,,लेकिन फिर भी FIR में इनका नाम नहीं था। यही से विपक्ष और अयोध्या के साधु-संत भड़क गए कि छोटी मछलियों को तो पकड़ लिया, लेकिन इन बड़े मगरमच्छों पर हाथ डालने से पुलिस क्यों कतरा रही है?””जैसे ही FIR दर्ज हुई, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक बेहद कड़क बयान सामने आया। योगी ने साफ कहा—अयोध्या पर आक्षेप मत करो, प्रभु श्री राम की मर्यादा का पालन करना सीखो. सीएम योगी ने कहा कि आस्था के साथ खिलवाड़ स्वीकार नहीं है. सनातन आस्था के साथ जो भी खिलवाड़ करेगा वह उसका भुक्तभोगी होगा. किसी को भी छूट नहीं दी जा सकती. ! इस बयान के तुरंत बाद दिल्ली और नागपुर में खलबली मच गई। दबाव इतना बढ़ा कि चंपत राय और अनिल मिश्रा को अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन क्या सिर्फ इस्तीफा ही काफी है? बीजेपी के अपने ही नेता रजनीश सिंह ने सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को चिट्ठी लिख दी है! रजनीश सिंह ने मांग की है कि सिर्फ इस्तीफे से काम नहीं चलेगा, चंपत राय और अनिल मिश्रा को तुरंत जेल भेजा जाए और इनकी अकूत संपत्ति की जांच की जाए। अब सवाल नागपुर और दिल्ली के संबंधों पर उठ रहे हैं कि क्या इन दोनों को सिर्फ इसलिए बचाया जा रहा है क्योंकि इनके तार RSS और वीएचपी के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े हैं?””लेकिन राजनीतिक सूत्र बताते हैं कि योगी आदित्यनाथ किसी के आगे झुकने वाले नेता नहीं हैं। इस वक्त दिल्ली और नागपुर, दोनों योगी के कड़े तेवरों के आगे दबाव महसूस कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ ने साफ और सीधा संदेश हाईकमान को भेज दिया है कि—भगवान श्री राम करोड़ों हिंदुओं की आस्था के प्रतीक हैं। जिसने भी प्रभु के खजाने में चोरी की है, उसे बख्शा नहीं जाएगा। योगी जानते हैं कि अगर इस मामले में ढील दी गई, तो साल 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी का ‘राम नाम सत्य’ होना तय है। क्योंकि जिस ‘राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ के नारे पर बीजेपी सत्ता में आई, अगर उसी मंदिर के दानपात्र सुरक्षित नहीं हैं, तो सनातन प्रेमी नाराज हो जाएंगे।योगी के सियासी विरोधी भले ही उन पर चौतरफा हमला कर रहे हों, लेकिन इतिहास गवाह है—योगी आदित्यनाथ पर जब-जब दबाव बढ़ा है, वो और ज्यादा मजबूती से उभरे हैं। अब देखना यह है कि क्या योगी इन ‘रामद्रोहियों’ को सलाखों के पीछे भेजकर इस राजनीतिक चक्रव्यूह को तोड़ पाएंगे?