उत्तर प्रदेश की सियासत इस वक्त अपने चरम उबाल पर है। विरोधी दल लगातार यह सोच रहे थे कि वे हमले दर हमले करते जाएंगे और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बैकफुट पर रहकर सब बर्दाश्त करते रहेंगे। लेकिन कहते हैं न कि शेर जब दो कदम पीछे खींचता है, तो वह डरता नहीं बल्कि एक बड़ी छलांग की तैयारी कर रहा होता है।

उत्तर प्रदेश में ठीक ऐसा ही हुआ है। विरोधी जिस मुद्दे पर खुद को भारी समझ रहे थे, अयोध्या की पावन धरती से योगी आदित्यनाथ ने उसी मुद्दे पर ऐसा पलटवार किया है जिससे विपक्ष के खेमे में खलबली मच गई है। आरएसएस की ‘खुली छूट’ और दिल्ली (बीजेपी आलाकमान) के भरोसे के साथ योगी आदित्यनाथ ने न सिर्फ विरोधियों के बनाए नैरेटिव को ध्वस्त किया है, बल्कि विरोधियों में भगदड़ जैसी स्थिति पैदा कर दी है। अयोध्या को लेकर विपक्ष लगातार योगी सरकार, बीजेपी और आरएसएस को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहा था। मंदिर ट्रस्ट को लेकर कई तरह के आरोप उछाले जा रहे थे। लेकिन अयोध्या पहुंचकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। उन्होंने बिना लाग-लपेट के सीधे समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करते हुए कई चुभते सवाल पूछे योगी ने कड़ा प्रहार करते हुए याद दिलाया कि आज आस्था की बात करने वालों ने कभी अयोध्या की पवित्र हनुमानगढ़ी में नमाज़ पढ़वाने का ‘पाप’ किया था। उन्होंने ललकारते हुए पूछा कि क्या कोई जामा मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ करवा सकता है? अगर नहीं, तो हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर यह कृत्य क्यों होने दिया गया था? सीएम योगी ने स्पष्ट किया कि विपक्ष को विकास से नहीं, बल्कि महापुरुषों के सम्मान से चिढ़ है। उन्होंने कहा कि महर्षि वाल्मीकि के नाम पर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और निषादराज गुह के नाम पर रैन बसेरा बनने से उन लोगों को तकलीफ हो रही है जो कभी इन जमीनों पर वक्फ के नाम पर कब्जा करवाना चाहते थे। मंशा साफ हो तो कार्य अपने आप होते हैं, नीति स्पष्ट हो तो नियंता अपने आप सहयोग करता है। आज वह अयोध्या में दिखाई देता है।” यूपी की सियासत का दूसरा मोर्चा इस वक्त पश्चिम उत्तर प्रदेश का मेरठ बना हुआ है। बीए की छात्रा ललिता गौतम की दुखद हत्या को आधार बनाकर भीम आर्मी के चंद्रशेखर आज़ाद और अन्य दलित संगठन सड़कों पर हैं। हालांकि पुलिस प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपी अंकुश और उसके साथियों को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन इसके बावजूद मुआवजे और नौकरी की मांग को लेकर प्रदर्शन जारी रहे। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा, जिसके बाद दलित संगठन और उग्र हो गए। लेकिन इस मामले में एक दिलचस्प सियासी मोड़ तब आया जब बसपा सुप्रीमो मायावती ने योगी प्रशासन के रुख का परोक्ष रूप से समर्थन किया। मायावती ने साफ कहा कि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के बनाए संविधान के दायरे में ही काम होगा। उन्होंने कुछ नेताओं पर अपनी राजनीति चमकाने के लिए मासूम युवाओं को उकसाकर उन पर मुकदमे दर्ज करवाने का आरोप लगाया। यह सीधे तौर पर चंद्रशेखर आज़ाद और विपक्षी धड़े पर निशाना था। राजनीतिक गलियारों और सूत्रों के हवाले से यह साफ है कि आरएसएस और बीजेपी आलाकमान ने उत्तर प्रदेश में एक बार फिर योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व पर पूर्ण विश्वास जताया है। संघ का मानना है कि विपक्ष द्वारा फैलाए जा रहे “संविधान खतरे में है” और “दलित-पिछड़ा विरोधी सरकार” जैसे नैरेटिव को केवल योगी आदित्यनाथ का प्रखर और बेबाक अंदाज ही तोड़ सकता है।

अखिलेश यादव जहां 2027 के चुनाव को ‘संविधान बचाने का आखिरी चुनाव’ बताकर पिछड़े और दलित मतदाताओं को लामबंद करने में जुटे हैं, वहीं बीजेपी आलाकमान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अगला चुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे और नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। यह सच है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने इस वक्त चौतरफा चुनौतियां हैं। एक तरफ पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर सामान्य जाति के युवाओं में असंतोष को भुनाने की विपक्षी कोशिशें हैं, तो दूसरी तरफ दलित और पिछड़ों को बीजेपी से दूर छिटकाने का एक बड़ा चक्रव्यूह बुना जा रहा है। लेकिन योगी आदित्यनाथ की सियासत का इतिहास गवाह है कि वह दबाव में बिखरते नहीं, बल्कि और निखरते हैं। यदि योगी आदित्यनाथ विरोधियों के इस चक्रव्यूह को तोड़कर 2027 में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार वापस लाते हैं, तो न सिर्फ उत्तर प्रदेश में उनका कद बड़ा हो जाएगा, बल्कि भविष्य के लिए दिल्ली का रास्ता भी उनके लिए और अधिक साफ हो जाएगा। अयोध्या की दहाड़ इस बात का स्पष्ट संकेत है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता का संग्राम अब बेहद दिलचस्प और आक्रामक मोड़ पर पहुंच चुका है।






