अमेठी: गांधी परिवार की राजनीतिक पहचान से जुड़े अमेठी जिले की गौरीगंज विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास हमेशा से दिलचस्प और बेहद करीबी मुकाबलों वाला रहा है। यहां किसी एक राजनीतिक दल का लंबे समय तक स्थायी दबदबा नहीं रहा। कांग्रेस, बीजेपी, बसपा और समाजवादी पार्टी अलग-अलग दौर में इस सीट पर जीत दर्ज कर चुकी हैं। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले गौरीगंज का सियासी समीकरण एक बार फिर बदलता दिखाई दे रहा है।इस बदलाव के केंद्र में लगातार तीन चुनाव जीत चुके विधायक राकेश प्रताप सिंह हैं, जो अब समाजवादी पार्टी का हिस्सा नहीं हैं। सपा से उनके रिश्ते टूटने और बीजेपी के साथ उनकी बढ़ती नजदीकियों ने अगले विधानसभा चुनाव को लेकर अटकलें तेज कर दी हैं।
तीन चुनाव जीतकर बनाई व्यक्तिगत पकड़
गौरीगंज का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां मुकाबला अक्सर बेहद करीबी रहा है। 1991 में बीजेपी के तेजभान सिंह ने महज 189 वोटों से जीत दर्ज की थी। 1996 में भी तेजभान सिंह सिर्फ 602 वोटों से विजयी हुए। वहीं 2002 में कांग्रेस के नूर मोहम्मद ने 267 वोटों के मामूली अंतर से चुनाव जीता था।2012 में राकेश प्रताप सिंह ने महज 503 वोटों से जीत दर्ज कर गौरीगंज में सपा का खाता खोला। इसके बाद उनका राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ता गया।2017 में जब उत्तर प्रदेश में बीजेपी की मजबूत लहर थी, तब भी राकेश प्रताप सिंह ने अपनी सीट बचाते हुए करीब 26 हजार वोटों के अंतर से जीत हासिल की। 2022 में भी बीजेपी की चुनौती के बावजूद उन्होंने लगभग 6,963 वोटों से जीत दर्ज की।लगातार तीन जीत ने यह संकेत दिया कि गौरीगंज में राकेश प्रताप सिंह की अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ है।
सपा से निष्कासन के बाद बदला समीकरण
राकेश प्रताप सिंह और समाजवादी पार्टी के बीच लंबे समय से तनाव की खबरें सामने आती रही थीं। राज्यसभा चुनाव में पार्टी लाइन से अलग जाकर बीजेपी उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने के बाद विवाद और बढ़ गया।इसके बाद वह हिंदुत्व और सनातन से जुड़े मुद्दों पर भी मुखर नजर आए। आखिरकार 23 जून 2025 को समाजवादी पार्टी ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2027 में राकेश प्रताप सिंह किस राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे। बीजेपी के साथ उनकी नजदीकियों को देखते हुए उनके भगवा खेमे में जाने की अटकलें तेज हैं, लेकिन अंतिम फैसला अभी सामने नहीं आया है।
बीजेपी के लिए मौका भी, चुनौती भी
अगर बीजेपी राकेश प्रताप सिंह को अपना उम्मीदवार बनाती है तो पार्टी को लगातार तीन बार जीत चुके मजबूत स्थानीय चेहरे का फायदा मिल सकता है। उनका व्यक्तिगत वोट बैंक बीजेपी के लिए अतिरिक्त ताकत बन सकता है।लेकिन टिकट का फैसला पार्टी के लिए आसान नहीं होगा। स्थानीय स्तर पर लंबे समय से चुनावी तैयारी कर रहे संभावित दावेदारों की नाराजगी भी बीजेपी के सामने चुनौती बन सकती है।
सपा के सामने बड़ी चुनौती
राकेश प्रताप सिंह के बाहर होने के बाद समाजवादी पार्टी को गौरीगंज में नए चेहरे की तलाश करनी होगी। पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऐसा उम्मीदवार खड़ा करना होगी, जो संगठन के साथ-साथ राकेश प्रताप सिंह की व्यक्तिगत पकड़ को भी चुनौती दे सके।सपा अगर अपना पारंपरिक वोट बैंक मजबूत रखने के साथ नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने में सफल रहती है, तो मुकाबला बेहद रोचक हो सकता है।
जातीय समीकरण भी तय करेंगे परिणाम
गौरीगंज में क्षत्रिय मतदाताओं की अहम भूमिका मानी जाती है। इसके अलावा ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाता भी चुनावी नतीजे पर प्रभाव डाल सकते हैं।बीजेपी की रणनीति सवर्ण मतदाताओं के साथ गैर-यादव पिछड़े और दलित वोटों तक पहुंच मजबूत करने की हो सकती है। वहीं सपा अपने यादव-मुस्लिम आधार को मजबूत रखने के साथ अन्य पिछड़े और दलित वर्गों में विस्तार की कोशिश कर सकती है।कांग्रेस की ऐतिहासिक मौजूदगी और बसपा का प्रदर्शन भी इस सीट के नतीजे को प्रभावित कर सकता है। अगर मुकाबला त्रिकोणीय हुआ तो कुछ हजार वोट भी पूरा चुनावी परिणाम बदल सकते हैं।कुल मिलाकर गौरीगंज में 2027 की सियासी लड़ाई सिर्फ राकेश प्रताप सिंह बनाम सपा या बीजेपी की नहीं होगी। यह व्यक्तिगत प्रभाव, पार्टी संगठन और सामाजिक समीकरण—तीनों की परीक्षा होगी। अमेठी की इस सीट पर अभी चुनाव में समय है, लेकिन सियासी बिसात बिछ चुकी है और 2027 में गौरीगंज उत्तर प्रदेश की सबसे चर्चित सीटों में शामिल हो सकती है।