“क्या आरक्षण की मांग पर सवाल उठाना ही देशद्रोह है? क्या आर्थिक आधार पर हक मांगना कोई गुनाह है?” दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी एक चिनगारी ने आज पूरे देश की सियासत में भूचाल ला दिया है! सामान्य जाति—ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य सवर्ण समाजों ने जब दिल्ली के दिल में अपने हक और आरक्षण की व्यवस्था में सुधार के लिए हुंकार भरी, तो मानों सत्ता के गलियारों से लेकर विपक्ष के खेमों तक हड़कंप मच गया। सवाल सिर्फ एक है—क्या 4-4 पीढ़ियों से सरकारी नौकरी और मजबूत अर्थव्यवस्था का लुत्फ उठा रहे लोगों को ही आरक्षण मिलना चाहिए? या फिर किसी गरीब पंडित, गरीब ठाकुर या जरूरतमंद का भी इस देश पर उतना ही हक है?
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दिल्ली की हुंकार के बाद देश के तमाम बड़े नेताओं के बयान सामने आने लगे हैं और इस आंदोलन ने राजनीति की पूरी पोल खोल कर रख दी है.. रामदास अठावले (केंद्रीय मंत्री): इन्होंने तो साफ कह दिया कि “कक्षा आरक्षण हटाने की मांग करने वाले देशद्रोही हैं।”चिराग पासवान आरक्षण को लेकर आक्रामक सुर में बोले,उन्होंने कहा “यह कोई खैरात नहीं है जो किसी के कहने से खत्म हो जाएगी।”अखिलेश यादव (सपा प्रमुख): जिनका पीडीए (PDA) का गणित चल रहा था, अब कह रहे हैं कि यह सब बीजेपी की ही चाल है और आरक्षण खत्म करने की बड़ी साजिश रची जा रही है। चंद्रशेखर आजाद चेतावनी भरे अंदाज में कहा, “अगर आरक्षण हटाने की बात आई, तो देश में ऐसा भूचाल आएगा जो किसी ने कभी देखा नहीं होगा। आरक्षण हमारा हक और अधिकार है।”मायावती ने भी साफ कर दिया है कि आरक्षण गरीबों और वंचितों का हक है, इसे कोई नहीं छीन सकता।इसके आलावा बीजेपी के बड़े नेता गृह मंत्री अमित शाह कह रहे है कि जब तक बीजेपी है, कोई आरक्षण को हाथ भी नहीं लगा सकता। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संसद में बाबा साहब के योगदान को याद कर आरक्षण के संरक्षण की गारंटी दे चुके हैं।इसके आलावा राजनाथ सिंह तो कदम आगे बढ़ते हुए कहा कि किसी के माई के लाल ने दूध नहीं पिया है जो आरक्षण को ख़त्म कर पाये .

अब सोचिए! सत्ता पक्ष हो या विपक्ष… हर कोई सिर्फ एक ही तरफ खड़ा नजर आ रहा है। जंतर-मंतर पर उमड़ी लाखों की भीड़ का आरोप है कि जिस सामान्य समाज ने बीजेपी और अन्य दलों को झोली भरकर वोट दिया, आज उनके समाज का एक भी बड़ा नेता उनके समर्थन में खुलकर खड़ा होने को तैयार नहीं है। सामान्य वर्ग की मांग बेहद स्पष्ट और सीधी है,, आरक्षण पूरी तरह खत्म न हो, लेकिन इसे आर्थिक आधार (Economic Basis) पर लागू किया जाए। दूसरा एससी-एसटी एक्ट (SC/ST Act) और यूजीसी नियमों के नाम पर होने वाले उत्पीड़न पर रोक लगे। जो परिवार चार पीढ़ियों से संपन्न हैं, उन्हें क्रीमी लेयर के तहत बाहर किया जाए और वास्तविक गरीबों को इसका लाभ मिले। मामला यहीं शांत नहीं हो रहा है। आज लखनऊ में समान मोर्चा और संदीप सिंह के नेतृत्व में एक बहुत बड़े आंदोलन का हुवा वहीं दूसरी तरफ, दिल्ली, बिहार, राजस्थान और हरियाणा के कई संगठनों ने साफ ऐलान कर दिया है कि अब सरकार से आर-पार की लड़ाई होगी! दूसरी ओर, संगठन के अंदर भी घमासान जारी है। हर्ष दुबे द्वारा सरकार के प्रतिनिधि बृजेश पाठक से मुलाकात करने पर सामान्य वर्ग में भारी नाराजगी देखी जा रही है। लोगों का गंभीर आरोप है कि समाज की मांगों के साथ समझौता किया जा रहा है। अब देखना यह होगा कि क्या देश की सरकार सामान्य वर्ग के इस आक्रोश और उनकी आर्थिक आधार वाली मांग पर कोई ठोस विचार करती है, या फिर आने वाले चुनावों की बलि यह आंदोलन भी चढ़ जाएगा? क्या यह हुंकार और तेज होगी या सियासत के दबाव में दब जाएगी—यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा!