रायबरेली: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले रायबरेली की ऊंचाहार विधानसभा सीट पर सियासी हलचल तेज होती दिखाई दे रही है। कभी समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर अब मुकाबले की तस्वीर बदल चुकी है। तीन बार सपा के टिकट पर चुनाव जीत चुके मनोज कुमार पांडे अब बीजेपी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बीजेपी 2027 में उन्हें एक बार फिर ऊंचाहार से मैदान में उतारेगी या पार्टी किसी नए चेहरे पर दांव लगाएगी?
मनोज पांडे के सामने अगर बीजेपी का टिकट बरकरार रहता है तो उनका मुकाबला किससे होगा, यह भी अभी स्पष्ट नहीं है। दूसरी ओर सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की स्थिति में दोनों दलों के सामने ऐसा उम्मीदवार उतारने की चुनौती होगी, जो मनोज पांडे के व्यक्तिगत प्रभाव और बीजेपी के संगठनात्मक आधार को चुनौती दे सके।
सपा से बीजेपी तक बदली मनोज पांडे की सियासत
मनोज कुमार पांडे ने 2012, 2017 और 2022 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर ऊंचाहार से जीत दर्ज की थी। सपा में रहते हुए उन्हें पार्टी के प्रमुख नेताओं में गिना जाता था और वह अखिलेश यादव के करीबी नेताओं में शामिल रहे।
हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान उनकी राजनीतिक दिशा बदल गई। उन्होंने बीजेपी के समर्थन में प्रचार किया और बाद में बीजेपी में शामिल हो गए। इसके बाद योगी आदित्यनाथ सरकार में उन्हें कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी मिली।
अब यही राजनीतिक बदलाव 2027 के चुनाव में ऊंचाहार की लड़ाई को दिलचस्प बना रहा है। सवाल है कि क्या मनोज पांडे अपने पुराने व्यक्तिगत जनाधार को बीजेपी के वोट बैंक के साथ जोड़ पाएंगे?
तीन जीत सबसे बड़ा प्लस फैक्टर
मनोज पांडे के पक्ष में सबसे मजबूत बात उनका चुनावी अनुभव और ऊंचाहार में लंबे समय से बना राजनीतिक नेटवर्क है। लगातार तीन बार विधायक चुने जाने के कारण क्षेत्र में उनकी व्यक्तिगत पहचान मजबूत मानी जाती है।
बीजेपी में शामिल होने के बाद मंत्री पद मिलना भी उनके राजनीतिक कद को दर्शाता है। हालांकि, विधानसभा टिकट का फैसला केवल राजनीतिक पद या पिछले चुनावी रिकॉर्ड के आधार पर नहीं होता। स्थानीय संगठन, संभावित दावेदार, जातीय समीकरण और पार्टी की चुनावी रणनीति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
सपा-कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती
मनोज पांडे के बीजेपी में जाने के बाद सपा के लिए ऊंचाहार सीट की लड़ाई और महत्वपूर्ण हो गई है। सपा की कोशिश होगी कि ऐसा उम्मीदवार मैदान में उतारा जाए, जो मनोज पांडे के पुराने सामाजिक आधार में सेंध लगा सके।वहीं रायबरेली लोकसभा सीट से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के सांसद होने के कारण कांग्रेस की भी इस क्षेत्र में दावेदारी महत्वपूर्ण हो सकती है। गठबंधन में सीट किस पार्टी के खाते में जाती है और कौन उम्मीदवार मैदान में उतरता है, इस पर सबकी नजर रहेगी।
स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में अजय पाल सिंह, अतुल सिंह, बीएन मौर्य और उत्कर्ष मौर्य जैसे नामों की चर्चा होती रही है। हालांकि, इन नामों को लेकर अभी किसी दल की ओर से आधिकारिक उम्मीदवार की घोषणा नहीं हुई है।
मौर्य वोट पर भी नजर
ऊंचाहार में मौर्य-कुशवाहा मतदाताओं की भूमिका को भी अहम माना जाता है। ऐसे में मौर्य समाज से आने वाला मजबूत उम्मीदवार चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकता है। उत्कर्ष मौर्य पहले बीजेपी के टिकट पर मनोज पांडे के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं और क्षेत्र में उनकी राजनीतिक पहचान है।
इसके अलावा पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य और उनके परिवार की भी क्षेत्रीय राजनीति में पहचान रही है। ऐसे में 2027 के चुनाव में मौर्य वोटों का रुख किस तरफ जाता है, यह भी मुकाबले का महत्वपूर्ण पहलू हो सकता है।
जातीय समीकरण बनाएगा जीत की राह?
ऊंचाहार में पासी, यादव, मौर्य-शाक्य, ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित और क्षत्रिय मतदाताओं की मौजूदगी चुनावी गणित को बहुआयामी बनाती है। किसी एक जातीय समूह के समर्थन से चुनाव जीतना आसान नहीं होगा।
मनोज पांडे की चुनौती होगी कि वह सपा के दौर में मिले अपने व्यक्तिगत समर्थन को बीजेपी के संगठन और वोट बैंक के साथ जोड़ें। वहीं सपा-कांग्रेस गठबंधन को ऐसा चेहरा तलाशना होगा, जो यादव-मुस्लिम आधार के साथ पासी, मौर्य और दलित मतदाताओं के बीच भी मजबूत पकड़ बना सके।
फिलहाल 2027 का चुनाव अभी दूर है, इसलिए टिकट और उम्मीदवारों को लेकर किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना तय है कि ऊंचाहार में इस बार मुकाबला केवल पार्टी के चुनाव चिह्न का नहीं होगा। यहां व्यक्तिगत प्रभाव, जातीय समीकरण, गठबंधन और बूथ स्तर की रणनीति मिलकर नतीजे की दिशा तय कर सकते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या मनोज पांडे बीजेपी के टिकट पर ऊंचाहार से चौथी बार जीत का रिकॉर्ड बनाएंगे, या सपा-कांग्रेस गठबंधन कोई ऐसा चेहरा उतारेगा जो उनके पुराने गढ़ में नया सियासी समीकरण खड़ा कर दे?
