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राजधानी में बेखौफ हत्याएं, बेबस पुलिस

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11 साल में 4 जघन्य कांड, एक भी कत्ल का खुलासा नहीं – सवालों के घेरे में लखनऊ पुलिस

लखनऊ। प्रदेश की राजधानी लखनऊ को उत्तर प्रदेश के सबसे सुरक्षित शहरों में गिना जाता है, वहां बीते एक दशक में हुए चार खौफनाक हत्याकांड आज भी पुलिस के लिए अबूझ पहेली बने हुए हैं। साल 2015 से लेकर 2017 के बीच दो महिलाओं समेत आठ लोगों की नृशंस हत्या हुई, लेकिन तमाम दावे, जांच और टीमें लगाने के बावजूद पुलिस आज तक हत्यारों तक नहीं पहुंच सकी। इन वारदातों की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये घटनाएं किसी दूरदराज़ इलाके में नहीं, बल्कि राजधानी के उन इलाकों में हुईं, जहां पुलिस की गश्त, सायरन बजाती गाड़ियां और हाई अलर्ट व्यवस्था हमेशा दिखाई देती है। इसके बावजूद अपराधियों ने खुलेआम गोलियां बरसाईं, गर्दनें काटीं और आराम से फरार हो गए।

क्राइम ब्रांच, सर्विलांस और STF की कोशिशें नाकाम, फाइलों में दफन हो गए हत्याकांड

स्थानीय पुलिस, क्राइम ब्रांच और सर्विलांस टीमों ने हर मामले में “पूरी ताकत झोंकने” के दावे किए, लेकिन नतीजा शून्य रहा। आज हालात यह हैं कि पीड़ित परिवार इंसाफ की आस में थक चुके हैं और पुलिस की विवेचना पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

राजधानी के वो चार काले अध्याय, जिनका सच आज भी अधूरा

मड़ियांव डबल मर्डर केस (2015)

आईआईएम रोड पर करीब एक किलोमीटर के दायरे में चार पैर और दो महिलाओं के धड़ मिलने से शहर दहल गया था। पुलिस ने पहचान और हत्या के कारणों को लेकर लंबी जांच की, लेकिन 10 साल बाद भी न आरोपी, न वजह सामने आ सकी।

हसनगंज ATM लूट-कांड (2015)

चरही बाजार स्थित HDFC ATM के बाहर हथियारबंद बदमाशों ने एक कस्टोडियन समेत तीन लोगों को गोलियों से भून दिया और कैश बॉक्स लूटकर फरार हो गए। पुलिस लाइन से चंद कदमों की दूरी पर हुई इस वारदात ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी, लेकिन खूनी लुटेरे आज भी आज़ाद हैं।

विकासनगर डबल मर्डर (2016)

मुन्ना बजरंगी के साले पुष्पजीत सिंह और उसके साथी संजय मिश्र की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई। गैंगवार और पेशेवर शूटरों के एंगल पर जांच चली, लेकिन कातिल पुलिस की पकड़ से बाहर रहे।

गोमतीनगर मर्डर केस (2017)

ग्वारी गांव के पास मुन्ना बजरंगी के करीबी मोहम्मद तारिक को गोलियों से छलनी कर दिया गया। यह वारदात उस समय हुई जब पूरा शहर मतगणना के चलते छावनी में तब्दील था। पुलिस ने कई जिलों में दबिश दी, फिर भी हत्यारे नहीं मिले।

2015 से 2026 तक बदला साल, नहीं बदली पुलिस की कहानी

2015, 2016, 2017… फिर 2020, 2022, 2024 और अब 2026। साल दर साल बदले, सरकारें बदलीं, अधिकारी बदले, लेकिन इन जघन्य हत्याओं का सच नहीं बदला। सवाल यह है कि क्या पुलिस ने इन मामलों में चुपचाप हार मान ली? क्या ये फाइलें सिर्फ रिकॉर्ड रूम की शोभा बनकर रह गई हैं?

अधिकारियों के दावों पर भारी ज़मीनी हकीकत

एक ओर अपराध नियंत्रण के बड़े-बड़े दावे, दूसरी ओर राजधानी में हुए सबसे सनसनीखेज हत्याकांडों का आज तक खुलासा नहीं। यह स्थिति न सिर्फ पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाती है, बल्कि आम जनता की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करती है।

अब बड़ा सवाल

क्या इन मामलों की दोबारा निष्पक्ष जांच होगी, या राजधानी के ये कत्ल हमेशा के लिए “अनसुलझी फाइल” बनकर रह जाएंगे?

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