उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर शब्दों की जंग छिड़ चुकी है और इस बार वार बेहद तीखा है।नगीना से सांसद और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद रावण ने सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भिड़ने की तैयारी कर ली है रावण ने योगी को एक ढोंगी मुख्यमंत्री तक कह दिया। यही नहीं चंद्र शेखर आजाद ने ये भी कहा बहुजन महापुरषों का सम्मान योगी आदित्यनाथ नहीं करते और जब यही योगी अभी बाहर जापान गये थे तो वहां राम की नगरी का नाम न लेकर बुध्द की धरती बताकर अपने आप को गौरवान्तित्त महसूस कर रहे थे मुसलमानों और दलितों के घोर विरोधी योगी आदित्यनाथ है।
अब सवाल उठता है है कि आखिर चंद्रशेखर के निशाने पर योगी आदित्यनाथ क्यों हैं? क्या यह सिर्फ राजनीतिक मजबूरी है? क्या यह 2017 की कार्रवाई का बदला है? या फिर 2027 के चुनाव से पहले अपनी जमीन तैयार करने की बड़ी रणनीति? क्योंकि सियासी जानकार कहते हैं योगी आदित्यनाथ के रहते उत्तर प्रदेश की राजनीति में चंद्रशेखर की राह आसान नहीं है और शायद यही वजह है कि हमला सबसे ज्यादा वहीं हो रहा है जहां से सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ मिल सकता है। दरअसल चंद्रशेखर आजाद का हालिया फेसबुक लाइव सिर्फ एक बयान नहीं था बल्कि एक पूरा राजनीतिक संदेश था। उनके भाषण का बड़ा हिस्सा मुस्लिम मुद्दों पर केंद्रित रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को नमाज नहीं पढ़ने दी जा रही, उनमें डर का माहौल बनाया जा रहा है और उन्हें न्याय नहीं मिल रहा।
सड़क पर होली हो सकती है तो नमाज क्यों नहीं पड़ा जा सकता है योगी सरकार मुसलमानों से नफरत क्यों कर रही है। इन सवालों के साथ ही रावण ने अपने समर्थकों से रोज ₹1 का सहयोग देने की अपील की। यह साफ संकेत है कि वह अपनी पार्टी को आंदोलन की राजनीति के जरिए बड़ा बनाने की तैयारी में हैं। लेकिन अगर इस पूरी सियासत को गहराई से समझें तो योगी और चंद्रशेखर की टकराव की जड़ें काफी पुरानी हैं। 2017 का सहारनपुर मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। उस समय हिंसा के बाद योगी सरकार ने सख्त रुख अपनाया था और चंद्रशेखर आजाद पर कई गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज हुए थे। एसटीएफ ने उन्हें हिमाचल प्रदेश के डलहौजी से गिरफ्तार किया था और वह कई महीने जेल में रहे। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि यहीं से दोनों नेताओं के बीच सियासी टकराव खुलकर सामने आया।
ALSO READ:गोरखपुर के गिड़ा सेक्टर 13 वुड प्लाई फैक्ट्री में लगी भीषण आग
हालांकि बाद में सरकार की सिफारिश पर ही चंद्रशेखर को रिहा किया गया था। कहा गया कि उनकी मां की अपील के आधार पर यह फैसला लिया गया। लेकिन जेल से बाहर आते ही चंद्रशेखर ने बीजेपी पर ही हमला बोल दिया और कहा कि सरकार ने राजनीतिक दबाव में उन्हें छोड़ा।इसके बाद 2022 का चुनाव आया और चंद्रशेखर ने सीधे गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चुनाव लड़कर सियासी चुनौती दे दी। हालांकि नतीजा उनके पक्ष में नहीं गया और उन्हें भारी हार का सामना करना पड़ा। लेकिन राजनीति में हार के बाद भी उन्होंने अपने तेवर कम नहीं किए। 2024 में नगीना से सांसद बनने के बाद उनका राजनीतिक कद जरूर बढ़ा और अब वह खुद को दलित-मुस्लिम राजनीति के नए चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। राजनीतिक सूत्रों का मानना है कि चंद्रशेखर की रणनीति सीधी है जितना ज्यादा वह योगी और बीजेपी पर हमला करेंगे उतना ही वह दलित और मुस्लिम वोट बैंक में अपनी पकड़ मजबूत कर पाएंगे। लेकिन इसका एक दूसरा राजनीतिक पहलू भी है। अगर मुस्लिम वोट चंद्रशेखर की तरफ शिफ्ट होता है तो समाजवादी पार्टी को नुकसान हो सकता है। अगर दलित वोट का एक हिस्सा उनकी तरफ जाता है तो बहुजन समाज पार्टी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
यानी सीधी लड़ाई बीजेपी से दिख रही है लेकिन सियासी नुकसान विपक्षी दलों को सबसे ज्यादा हो सकता है।चंद्र शेखर आजाद की पूर्व प्रेमिका रोहिणी घावरी खुले तौर रावण को अमित शाह का आदमी बताती आयी है उन्होंने अपने कई सारे पोस्टों इस बात का दावा किया है कि चंद्र शेखर पर बीजेपी का हाथ है इसीलिए बोलने की इतनी छूट मिल रही है। मुझे इंसाफ भी इसीलिए नहीं मिल रहा है। कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह भी कहते हैं कि चंद्रशेखर का आक्रामक तेवर अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के लिए नुकसान से ज्यादा फायदा भी बन सकता है क्योंकि इससे विपक्ष का वोट बैंक बंट सकता है। हालांकि यह भी उतना ही सच है कि उनकी आक्रामक भाषा का असर युवाओं पर पड़ रहा है। खासकर वह युवा जो खुद को सामाजिक न्याय की राजनीति से जोड़कर देखते हैं, वह तेजी से चंद्रशेखर के साथ जुड़ रहे हैं।अब सवाल यह है कि क्या चंद्रशेखर आजाद वास्तव में योगी आदित्यनाथ के सामने 2027 में बड़ी चुनौती बन पाएंगे या फिर उनका रोल सिर्फ सियासी समीकरण बिगाड़ने तक सीमित रहेगा? फिलहाल इतना जरूर साफ है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी बनाम चंद्रशेखर की यह लड़ाई आने वाले समय में और तेज होने वाली है। और अगर बयानबाजी का यही स्तर रहा तो 2027 का चुनाव सिर्फ पार्टियों का नहीं बल्कि सीधे तेवर बनाम ताकत की लड़ाई बन सकता है।






