“दो नावों पर सवारी करने वालों के लिए अब रास्ते बंद हो चुके हैं!” देश की सर्वोच्च अदालत ने एक ऐसा ‘ऐतिहासिक आदेश पास किया है, जिसने मजहब बदलने के साथ-साथ आरक्षण की मलाई खाने वालों की नींद उड़ा दी है। जस्टिस पी. के. मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच ने साफ़ शब्दों में चेतावनी दे दी है कि ‘आस्था बदलते ही अधिकार का अंत हो जायेगा ।’अब न कोई कन्फ्यूजन रहेगा, न कोई ‘इफ-एंड-बट’। अगर आपने हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़कर किसी और मजहब का दामन थामा, तो उसी पल अनुसूचित जाति यानिकि (SC) का आपका संवैधानिक सुरक्षा घेरा ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
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कोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक ‘डेड-एंड’ है जो धर्म परिवर्तन के बावजूद आरक्षण के फायदों को अपनी जेब में रखना चाहते थे।प्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 के क्लॉज-3 का हवाला दिया। इसमें साफ लिखा है कि SC का दर्जा केवल उन्हीं लोगों को मिलेगा जो तय किए गए धर्मों (हिंदू, सिख, बौद्ध) में आते हैं। कोर्ट ने कहा कि धर्म बदलने के बाद जन्म की जाति का आधार लेकर SC का दर्जा नहीं लिया जा सकता। इस फैसले के बाद धर्मांतरण करने वाले लोगों के SC आरक्षण के दावे कमजोर होंगे,,,सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के मामलों पर असर पड़ सकता है,,भविष्य में ऐसे मामलों में यह फैसला एक मिसाल बनेगा,,,सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई मामलों में कह चुका है कि SC का दर्जा सामाजिक भेदभाव के ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़ा है, जो मुख्य रूप से हिंदू सामाजिक संरचना से संबंधित था, इसलिए धर्म परिवर्तन के बाद स्थिति बदल जाती है।






