उत्तर प्रदेश की राजनीति इस वक्त धधक रही है… एक तरफ अयोध्या में rss की अहम बैठक हो रही है, दूसरी तरफ दिल्ली के सत्ता गलियारों में अमित शाह के डिप्टी पीएम बनने की चर्चाएं तेज हैं, और तीसरी तरफ उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक ताकत का नया परीक्षण होता दिखाई दे रहा है।
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सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि यूपी में क्या हो रहा है, सवाल यह है कि क्या दिल्ली, लखनऊ और नागपुर—तीनों जगह एक साथ कोई बड़ी राजनीतिक रणनीति लिखी जा रही है? क्या भाजपा 2027 और 2029 की जमीन अभी से तैयार कर रही है? क्या योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश तक सीमित रखने की रणनीति बन रही है? क्या अमित शाह को भविष्य का सबसे बड़ा राष्ट्रीय चेहरा बनाने की तैयारी है? और क्या राजनाथ सिंह को लेकर उड़ रही चर्चाओं का भी इसी पूरी तस्वीर से कोई संबंध है? इन सभी सवालों के बीच भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का लखनऊ दौरा और उनका गुटबाजी पर दिया गया संदेश राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ गया है। आखिर भाजपा के भीतर क्या बदल रहा है? आइए पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक नजरिए से समझते हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय केवल लखनऊ तक सीमित नहीं है। इसके तार सीधे दिल्ली और नागपुर से जुड़ते दिखाई दे रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने लखनऊ में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए साफ कहा कि पहले उत्तर प्रदेश में नेताओं के बीच गुटबाजी देखने को मिलती थी, लेकिन अब ऐसी राजनीति नहीं चलेगी। इस बयान को राजनीतिक जानकार केवल संगठनात्मक संदेश नहीं, बल्कि अनुशासन और शक्ति संतुलन का संकेत भी मान रहे हैं। दिलचस्प बात यह रही कि इस बयान के तुरंत बाद भाजपा के कई बड़े नेता सार्वजनिक मंच से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की खुलकर तारीफ करते नजर आए। उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने योगी सरकार के नेतृत्व की सराहना की। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कानून-व्यवस्था और विकास कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि नौ वर्षों में 90 वर्षों के बराबर काम हुआ है। केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी ने भी उत्तर प्रदेश में माफिया के खिलाफ हुई कार्रवाई को सरकार की बड़ी उपलब्धि बताया। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस घटनाक्रम की अलग-अलग व्याख्या की जा रही है। एक पक्ष का मानना है कि यह भाजपा की एकजुटता का सार्वजनिक प्रदर्शन था। वहीं दूसरा पक्ष इसे संगठन की उस रणनीति के रूप में देख रहा है, जिसमें चुनाव से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व पर किसी तरह का सार्वजनिक विवाद समाप्त करने का प्रयास किया जा रहा है।

राजनीतिक गलियारों में इस वक्त सबसे बड़ी चर्चा इस बात को भी लेकर है कि क्या केंद्रीय राजनीति में एक बड़ा नेतृत्व परिवर्तन होने वाला है? सूत्रों के मुताबिक, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर उन्हें केंद्रीय मुख्यधारा की राजनीति से ‘साइडलाइन’ करने की तैयारी है, जबकि अमित शाह का कद बढ़ाकर उन्हें देश का उप-प्रधानमंत्री (Deputy PM) बनाया जा सकता है राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि राजनाथ सिंह राष्ट्रपति बनते हैं, तो योगी आदित्यनाथ की भविष्य में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी स्वाभाविक रूप से कमजोर हो जाएगी। एक ही समाज (क्षत्रिय) से आने वाले दो व्यक्ति एक ही समय में देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पद पर आसीन हों, इसकी संभावना न के बराबर हो जाती है। यदि अमित शाह उप-प्रधानमंत्री बनते हैं, तो यह सीधा संदेश होगा कि २०२९ के लोकसभा चुनाव या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद भाजपा की कमान पूरी तरह से अमित शाह के हाथों में होगी। संगठन पर पहले से ही उनकी मजबूत पकड़ है, और इस पद के मिलते ही उनके नेतृत्व पर अंतिम मुहर लग जाएगी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि भविष्य में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में कोई बड़ा बदलाव होता है, तो उसका सीधा असर उत्तर प्रदेश की राजनीति पर भी दिखाई देगा। वहीं कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भाजपा का वर्तमान नेतृत्व अभी पूरी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के इर्द-गिर्द केंद्रित है और संगठनात्मक फैसलों में भी उनकी भूमिका सबसे प्रभावशाली मानी जाती है। योगी आदित्यनाथ की स्थिति को लेकर भी अलग-अलग राय सामने आती है। एक तरफ वे भाजपा के सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों में गिने जाते हैं और हिंदुत्व की राजनीति का मजबूत चेहरा माने जाते हैं। दूसरी तरफ राजनीतिक विश्लेषक यह भी कहते हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में किसी भी नेता का विस्तार केवल जनाधार से नहीं बल्कि संगठनात्मक समर्थन से भी तय होता है। भाजपा का संगठन इस समय पूरी तरह अमित शाह के नियंत्रण में माना जाता है।

अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े विवाद और दानपेटी से कथित हेराफेरी के मामलों ने संघ परिवार (RSS) को बेहद असहज कर दिया है। योगी आदित्यनाथ अपनी चिर-परिचित ‘एक्शन’ शैली के तहत इस मामले पर बेहद सक्रिय हैं और दोषियों पर कड़ा प्रहार करने की तैयारी में हैं। सूत्रों का कहना है कि योगी की इस त्वरित और सख्त कार्यशैली से दिल्ली और संगठन के कुछ शीर्ष नेता खुश नहीं हैं, क्योंकि इससे संगठन की छवि पर सीधा असर पड़ रहा है। योगी पर इस मामले में कड़ा रुख न अपनाने का ‘अदृश्य दबाव’ था, लेकिन वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। इस गतिरोध को सुलझाने और राम मंदिर ट्रस्ट के पुनर्गठन को लेकर संघ (RSS) ने अब खुद मोर्चा संभाल लिया है। अयोध्या में चल रही बड़ी बैठकों में यह तय होना है कि ट्रस्ट में कौन रहेगा और कौन जाएगा। साफ है कि संघ अब भाजपा के भीतर चल रही इस खींचतान में अपनी अंतिम मुहर लगाने की मुद्रा में आ गया है। अंततः, राजनीति का अंतिम सत्य यही है कि जिसके पास संगठन की चाबी होती है, वही पार्टी का नेतृत्व करता है। इस समय भाजपा के राष्ट्रीय से लेकर प्रांतीय संगठनों में सबसे ज्यादा प्रभावी नेता ‘मोदी-शाह’ गुट के ही करीबी माने जाते हैं। ऐसे में योगी आदित्यनाथ की अभूतपूर्व लोकप्रियता और प्रखर छवि ही उनके लिए एक तरह का ‘चक्रव्यूह’ बनती जा रही है। क्या योगी आदित्यनाथ दिल्ली के इस बिछाए हुए जाल से बाहर निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी दावेदारी को बचा पाएंगे, या फिर लखनऊ के ‘सिंहासन’ पर उन्हें सीमित कर दिल्ली की सियासत का नया अध्याय लिख दिया जाएगा? उत्तर प्रदेश की यह धधकती राजनीति आने वाले दिनों में देश की तकदीर तय करने वाली है।।






