बीजेपी से जब से सामन्य जाति के लोगो ने दुरी बनायीं तब से बीजेपी स्थित ख़राब होती हुयी नजर आ रही है,, जिस डिजिटल प्लेटफार्म पर बीजेपी का दब दबा हुवा करता था , वह अब धीरे धीरे खत्म होता हुवा नजर आ रहा है? क्या ब्राह्मण और ठाकुर समेत सामान्य वर्ग के उस बड़े डिजिटल सपोर्ट बेस ने बीजेपी से दूरी बनाई तो मोदी-शाह की सोशल मीडिया ताकत कमजोर पड़ गई? और क्या सरकार के कथित बड़े पैमाने पर कंटेंट हटाने के बीच यह सवाल और बड़ा हो गया है कि आखिर सोशल मीडिया पर बीजेपी का दबदबा कहां गया?
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दावा तो यहां तक किया जा रहा है कि 2014 के बाद पहली बार बीजेपी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर विपक्ष के दबाव में दिखाई दे रही है। लेकिन इसकी वजह क्या है और इसके पीछे चल क्या रहा है? आज हम आपको बताएँगे ,,दरअसल, सोशल मीडिया पिछले एक दशक में बीजेपी की राजनीति का सबसे बड़ा हथियार रहा है। सरकार के खिलाफ कोई नैरेटिव बनता, उससे पहले ही हजारों-लाखों समर्थक सोशल मीडिया पर उतरकर उसका जवाब देने लगते थे। सामान्य वर्ग के समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा भी बीजेपी के पक्ष में लगातार पोस्ट, कमेंट और वीडियो के जरिए माहौल बनाता था। राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि 98% सामान्य जाति के लोग, जो सोशल मीडिया पर बीजेपी के लिए मुफ्त में ढाल और तलवार बनकर लड़ते थे, अब यूजीसी, आरक्षण और सरकार की अनदेखी से नाराज होकर पीछे हट चुके हैं। नतीजा? जो विरोधी पहले एक पोस्ट डालने से डरते थे, आज वो हावी हैं! 2014 के बाद यह पहली बार है जब एक नई-नवेली पार्टी—’कॉकरोच जनता पार्टी’ के सामने बीजेपी का डिजिटल नैरेटिव नतमस्तक होता देखा गया !” “हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि अमित मालवीय की टीम से लेकर आईटी सेल तक सब पस्त हैं! मार्च से जुलाई के बीच महज 5 महीनों में 1,95,000 से ज्यादा blocking orders जारी किए गए। यानी रोजाना औसतन 1275 पोस्ट डिलीट हो रही हैं! जितनी देर में आप एक रील लाइक करते हैं, पीछे मशीनें सफाई अभियान चला रही हैं।

गृह मंत्रालय के सहयोग पोर्टल और मेटा के API ने मिलकर कंटेंट हटाना ऑटोमैटिक कर दिया है—अब इंसान नहीं, मशीनें तय कर रही हैं कि आपकी पोस्ट रहेगी या उड़ेगी! सवाल बड़ा है—क्या यह वाकई राष्ट्रीय सुरक्षा है या सिर्फ अपनी साख बचाने की जी-हजूरी?”क्योंकि अगर मशीन तय करने लगे कि कौन-सा कंटेंट हटेगा, तो फिर सवाल उठना लाजमी है कि अभिव्यक्ति की आजादी और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच सीमा कौन तय करेगा? और अब सियासी बहस यहीं से और तेज हो गई है। दावा किया जा रहा है कि 25 जुलाई के छात्र प्रदर्शन और उसके बाद सोशल मीडिया पर बढ़ी पोस्टों की बाढ़ ने सरकार की चिंता बढ़ाई। हालांकि इन दावों और घटनाओं की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। लेकिन सवाल बड़ा है—क्या बीजेपी का सबसे मजबूत डिजिटल हथियार अब उतना धारदार नहीं रहा? क्या सामान्य वर्ग की नाराजगी का असर जमीन के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी दिखाई देने लगा है? अगर ऐसा है, तो 2027 से पहले बीजेपी के लिए यह सिर्फ सोशल मीडिया की लड़ाई नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संकेत की घंटी हो सकती है।