पटना: बिहार की राजनीति में नेताओं के रिश्ते अक्सर स्थायी नहीं होते। वक्त, चुनाव और राजनीतिक जरूरतों के साथ समीकरण बदलते रहते हैं। इसका एक दिलचस्प उदाहरण मोकामा विधायक अनंत सिंह और केंद्रीय मंत्री व मुंगेर सांसद राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह के रिश्ते में देखा जा सकता है। एक दौर में दोनों के राजनीतिक रास्ते अलग दिखाई देते थे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दोनों के बीच नजदीकी की तस्वीर सामने आई है।
2024 के लोकसभा चुनाव में अनंत सिंह ने मुंगेर से जेडीयू प्रत्याशी ललन सिंह के समर्थन में प्रचार किया। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जब अनंत सिंह की गिरफ्तारी के बाद मोकामा में जेडीयू के प्रचार की जरूरत पड़ी, तब ललन सिंह ने खुद मैदान संभाला।
अब 2026 में जब अनंत सिंह और जेडीयू के वरिष्ठ नेता नीरज कुमार के बीच विवाद सामने आया, तो पार्टी ने इसे सुलझाने की जिम्मेदारी भी ललन सिंह को दी। अक्टूबर 2026 में नीतीश कुमार की ललन सिंह के आवास पर मुलाकात के बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव कम करने की कोशिश की गई और ललन सिंह ने बताया कि अनंत सिंह से सार्वजनिक बयानबाजी नहीं करने को कहा गया है।
तो आखिर इस रिश्ते में ऐसा क्या बदला?
2005 से शुरू हुई कहानी, जब अनंत सिंह जेडीयू के साथ आए
अनंत सिंह की राजनीति को समझने के लिए मोकामा और नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर को साथ देखना जरूरी है। 2005 में अनंत सिंह पहली बार जेडीयू के टिकट पर मोकामा से विधानसभा पहुंचे। उस समय ललन सिंह जेडीयू के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और नीतीश कुमार के करीबी माने जाते थे।यह वह दौर था जब अनंत सिंह का राजनीतिक कद लगातार बढ़ रहा था और मोकामा क्षेत्र में उनका प्रभाव मजबूत माना जाता था। 2005 से 2010 तक उनका जेडीयू के साथ राजनीतिक सफर जारी रहा।लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव ने समीकरण बदल दिए।
2015 में आई बड़ी राजनीतिक दूरी
2015 के विधानसभा चुनाव से पहले अनंत सिंह जेडीयू से अलग हो चुके थे। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मोकामा से चुनाव लड़ा और जेडीयू ने उनके खिलाफ नीरज कुमार को मैदान में उतारा।जेल में रहते हुए भी अनंत सिंह ने चुनाव जीता। चुनाव में उन्हें 54,005 वोट मिले, जबकि नीरज कुमार को 35,657 वोट मिले। इसके बाद अनंत सिंह और जेडीयू के बीच राजनीतिक दूरी का एक नया अध्याय शुरू हुआ।इसी दौर में नीरज कुमार और अनंत सिंह के बीच राजनीतिक मतभेद भी सामने आते रहे।
2019 में मुकाबला पहुंचा मुंगेर तक
2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक दूरी और साफ दिखाई दी। मुंगेर सीट से जेडीयू के टिकट पर ललन सिंह मैदान में थे, जबकि अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी कांग्रेस प्रत्याशी थीं।यानी मुकाबला अब सिर्फ मोकामा की विधानसभा राजनीति तक सीमित नहीं था। मुंगेर लोकसभा सीट पर दोनों खेमे आमने-सामने थे। नतीजे में ललन सिंह ने नीलम देवी को 1,67,937 वोटों के अंतर से हराया।लेकिन इसके बाद कहानी ने धीरे-धीरे करवट लेना शुरू किया।
2024 में बदली तस्वीर, ललन सिंह के साथ खड़े हुए अनंत सिंह
2024 के लोकसभा चुनाव में मुंगेर से ललन सिंह एक बार फिर जेडीयू प्रत्याशी बने। इस बार तस्वीर बिल्कुल अलग थी। अनंत सिंह ने ललन सिंह के समर्थन का ऐलान किया और चुनाव प्रचार में भी सक्रिय नजर आए।यानी 2019 में जहां दोनों नेताओं के राजनीतिक खेमे अलग थे, वहीं पांच साल बाद अनंत सिंह ललन सिंह के लिए प्रचार करते दिखे। मोकामा, मुंगेर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है और स्थानीय राजनीति में अनंत सिंह के प्रभाव को देखते हुए उनका समर्थन चुनावी अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया। 2024 में ललन सिंह ने मुंगेर सीट फिर जीती।
2025 में ललन सिंह ने संभाली अनंत सिंह की चुनावी कमान
रिश्तों में बदलाव का अगला बड़ा उदाहरण 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में दिखाई दिया।मोकामा से जेडीयू प्रत्याशी अनंत सिंह की दुलारचंद यादव हत्याकांड मामले में गिरफ्तारी के बाद ललन सिंह मोकामा पहुंचे और जेडीयू के चुनाव प्रचार की कमान संभाली। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ कई सभाएं कीं और अनंत सिंह के पक्ष में प्रचार किया।यह तस्वीर इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि कुछ साल पहले तक दोनों नेताओं के राजनीतिक रास्ते अलग-अलग दिखाई दे रहे थे। अब ललन सिंह उसी अनंत सिंह के लिए चुनाव मैदान में पार्टी का अभियान संभाल रहे थे।
2026 में फिर लौटी अनंत-नीरज की पुरानी तल्खी
2026 में विवाद ने एक बार फिर नया मोड़ लिया। पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जेडीयू ने नीरज कुमार को फिर उम्मीदवार बनाया। इसके बाद अनंत सिंह ने सार्वजनिक तौर पर नीरज कुमार की उम्मीदवारी का विरोध किया और जन सुराज समर्थित उम्मीदवार अनुज सिंह को समर्थन देने की बात कही।जेडीयू ने मामले को गंभीरता से लिया। पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने अक्टूबर की शुरुआत में कहा कि अनंत सिंह और नीरज कुमार के विवाद को सुलझाने की जिम्मेदारी ललन सिंह को दी गई है, क्योंकि मामला उनके क्षेत्र से जुड़ा है।
इसके बाद नीतीश कुमार की ललन सिंह से मुलाकात हुई। 5 अक्टूबर को ललन सिंह ने कहा कि उन्होंने अनंत सिंह से नीरज के खिलाफ सार्वजनिक बयान नहीं देने को कहा और अनंत सिंह ने इस पर सहमति जताई।हालांकि, इससे पहले ललन सिंह ने यह भी कहा था कि वह किसी के व्यक्तिगत झगड़े में नहीं पड़ते और समाधान तभी संभव है जब दोनों पक्ष इसके लिए तैयार हों।
आखिर बदला क्या?
अनंत सिंह और ललन सिंह की कहानी को सिर्फ व्यक्तिगत दोस्ती या दुश्मनी के नजरिए से देखना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। पिछले एक दशक में दोनों के राजनीतिक संदर्भ बदलते रहे हैं।2015 में अनंत सिंह और जेडीयू के बीच दूरी थी। 2019 में ललन सिंह और अनंत सिंह के परिवार के बीच सीधा चुनावी मुकाबला हुआ। 2024 में अनंत सिंह ने ललन सिंह का समर्थन किया। 2025 में ललन सिंह ने अनंत सिंह के लिए मोकामा में प्रचार किया और 2026 में पार्टी के अंदर अनंत सिंह और नीरज कुमार के विवाद को सुलझाने की जिम्मेदारी भी उन्हें दी गई।
इस पूरी टाइमलाइन से एक बात साफ दिखती है—बिहार की राजनीति में पुराने मतभेद और मौजूदा राजनीतिक समीकरण हमेशा एक जैसे नहीं रहते। अनंत सिंह और ललन सिंह के रिश्ते में आया बदलाव भी इसी बदलते राजनीतिक संदर्भ की कहानी है। अब सवाल यह है कि नीरज कुमार के साथ विवाद के बाद बनी यह नई दूरी कितनी स्थायी रहती है और आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम में अनंत सिंह, ललन सिंह और जेडीयू के बीच समीकरण किस दिशा में जाते हैं।
