उत्तर प्रदेश…देश की सबसे बड़ी राजनीतिक जमीन…और इस वक्त यहां कुछ ऐसा चल रहा है, जो सामान्य नहीं है! लगातार मीटिंग…एक-दो नहीं… तीन-चार नहीं…20 से ज्यादा हाई लेवल मीटिंग! लखनऊ से दिल्ली तक सियासी हलचल तेज…कभी केशव के घर मीटिंग…कभी बृजेश पाठक के यहां रणनीति…तो कभी योगी आदित्यनाथ और RSS आमने-सामने! और अब दिल्ली में हाईकमान के साथ बंद कमरे में मंथन तेज है ,,सवाल सीधा है —क्या यूपी बीजेपी में सब कुछ ठीक है…या फिर अंदर ही अंदर कोई बड़ा खेल चल रहा है? बीजेपी के बड़े चेहरे—बीएल संतोष, पंकज चौधरी, धर्मपाल…और फिर अमित शाह से लेकर प्रधानमंत्री मोदी तक सीधी रिपोर्टिंग! ये कोई साधारण समीक्षा नहीं है…ये है पावर और कंट्रोल की राजनीति! अब जरा समझिए अंदर की कहानी…2024 के चुनाव में यूपी से जो झटका बीजेपी को लगा, उसके बाद से ही पार्टी पूरी तरह अलर्ट मोड में है। और अब 2027 को लेकर—हर सीट, हर जाति, हर समीकरण का पोस्टमार्टम हो रहा है! लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है… क्या ये सारी कवायद सिर्फ चुनाव के लिए है? या फिर टारगेट कोई और है?
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राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा तेजी से तैर रही है—क्या योगी आदित्यनाथ को घेरने की तैयारी हो रही है? क्योंकि सच ये भी है—योगी आज बीजेपी के अंदर सबसे बड़े और सबसे मजबूत चेहरों में से एक हैं। उनकी लोकप्रियता…उनका आक्रामक स्टाइल…उनकी सीधी पकड़…हर किसी को चुभ रही है ,,,कहा जा रहा है कि कई नेताओं के लिए योगी ताकत है …लेकिन कुछ नेताओं के लिए योगी चुनौती भी है!याद करिए—केशव मौर्य का वो बयान—“संगठन सरकार से बड़ा होता है” उस एक लाइन ने ही बता दिया था कि अंदर कुछ तो खिचड़ी पक रही है! और अब पंकज चौधरी—जो सीधे मोदी और शाह के बेहद करीबी माने जा रहे है वो लगातार रिपोर्ट कार्ड लेकर हाईकमान के दरवाजे पर हैं। मतलब साफ है—सरकार का हर कदम अब संगठन के स्कैनर में है! कौन मंत्री रहेगा…किसका टिकट कटेगा…कौन आगे बढ़ेगा…सब कुछ दिल्ली तय करेगी! बीते कुछ दिनों से अगर आप बीजेपी की ,,यूपी को लेकर रणनीति देखोगे तो पाओगे कि बीजेपी का झुकाव दलित और OBC मतदाताओं की तरफ ज्यादा झुका है ,,संसद भवन जो देश प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी पहले ये कहते हुए दिखाई देते थे राम के बगैर राष्ट्र की परिकल्पना करना आशम्भव है वही मोदी आज उसी भवन में खड़े होकर आपने आपको , विशेषकर संसद में, इस बात का जिक्र किया है कि वे एक “अति पिछड़े समाज” (OBC) से आते हैं और यह भारतीय संविधान की ताकत है कि उन जैसा एक आम व्यक्ति सर्वोच्च पद तक पहुँच सका।उन्होंने जोर देकर कहा है कि उनके लिए संविधान ही सर्वोपरि है और वे इसके माध्यम से समाज के सभी वर्गों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हैं,,,यही नहीं बीते कुछ महीने कुछ साल में देश के पीएम ने ओबीसी और पिछड़े वर्ग को साधने के लिए बड़े फैसले लिए—NCBC को संवैधानिक दर्जा, 27% ओबीसी आरक्षण को मजबूती, मेडिकल AIQ में भी लागू, और 127वें संशोधन से राज्यों को अपनी OBC सूची का अधिकार मिला। पीएम विश्वकर्मा और मुद्रा योजना से आर्थिक ताकत दी गई, मुद्रा योजना के तहत 30% से अधिक ऋण SC/ST/OBC उद्यमियों को दिए गए हैं। जबकि स्कॉलरशिप और फेलोशिप से शिक्षा को बढ़ावा दिया । लेकिन जैसे-जैसे ओबीसी फोकस बढ़ा, सामान्य वर्ग में असंतोष भी उभरने लगा। यही नहीं मोदी सरकार obc समाज और पिछड़ो को साधने के लिए ugc कानून भी लायी लेकिन बीजेपी के लिये ugc कानून गले की हड्डी साबित हुई सामन्य जाति लोग सड़को पर उतर आये और जमकर विरोध किया जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ugc पर रोक लगा दी ,लेकिन फिलहाल मामला अभी भी गर्म है .

अब सवाल यही है—क्या यही रणनीति बीजेपी को मजबूत करेगी या नया सामाजिक संतुलन उसके लिए चुनौती बनेगा? बीजेपी का फोकस बदलता हुआ नजर आ रहा है। राम के नाम से आगे बढ़कर अब अंबेडकर, दलित और ओबीसी समीकरण पर पूरा जोर! क्योंकि बिना इनके 2027 की जीत आसान नहीं है। लेकिन यहीं पर सबसे बड़ा टकराव दिखता है… एक तरफ योगी की “हिंदुत्व + लॉ एंड ऑर्डर” वाली राजनीति… दूसरी तरफ संगठन की “जातीय समीकरण” वाली रणनीति… क्या दोनों लाइनें टकरा रही हैं? और ऊपर से हालिया घटनाएं—लखीमपुर… कासगंज… आगरा… नोएडा… हर घटना ने सरकार की छवि को चुनौती दी है। ऐसे में हाईकमान कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं दिख रहा। तो आखिर हो क्या रहा है? क्या यूपी में कैबिनेट बदलने वाली है? क्या तीसरा डिप्टी सीएम आएगा? या फिर सिर्फ सिस्टम को टाइट किया जा रहा है? या फिर…वो होने वाला है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की? फिलहाल सच्चाई चाहे जो भी हो—लेकिन इतना तय है— दिल्ली और लखनऊ के बीच जो सियासी तूफान उठ रहा है, उसका असर सीधा 2027 के चुनाव पर पड़ेगा! और आने वाले दिनों में यूपी की राजनीति…एक नया मोड़ ले सकती है!






