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उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म करने के फैसले पर विवाद तेज, जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने जताई आपत्ति

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उत्तराखंड सरकार द्वारा मदरसा बोर्ड को समाप्त कर अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण लागू करने के फैसले को लेकर विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। इस मुद्दे पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि धार्मिक और शैक्षिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय बताया है, संगठन ने सरकार से इस निर्णय पर पुनर्विचार करने और उच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय तक किसी भी प्रकार की कार्रवाई स्थगित रखने की मांग की है।

मदरसों के अस्तित्व पर उठे सवालों का विरोध

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रदेश महासचिव मौलाना शराफत अली कासमी ने कहा कि मदरसों को केवल मदरसा बोर्ड पर निर्भर मानना ऐतिहासिक और तथ्यात्मक रूप से गलत है, उन्होंने कहा कि मदरसे सदियों से धार्मिक और सामाजिक शिक्षा के केंद्र रहे हैं और विभिन्न व्यवस्थाओं के तहत उनका संचालन होता आया है, ऐसे में नई व्यवस्था लागू करना सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा है।

नई व्यवस्था से बढ़ सकती हैं प्रशासनिक जटिलताएं

संगठन ने चेतावनी दी कि प्रस्तावित अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के तहत नई प्रणाली लागू होने से कई व्यावहारिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, यदि किसी संस्था को दो अलग-अलग विभागों से मान्यता लेनी पड़ेगी, तो नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करना कठिन हो जाएगा, जिससे शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

धार्मिक शिक्षा में हस्तक्षेप पर जताई चिंता

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने यह भी कहा कि धार्मिक शिक्षा के स्वरूप में किसी भी प्रकार का अनावश्यक हस्तक्षेप चिंता का विषय है, संगठन के अनुसार, कुरआन, बाइबिल और गुरु ग्रंथ साहिब जैसे धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन एक निश्चित परंपरा और स्वरूप में होता है, जिसमें बदलाव या नियंत्रण धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों के खिलाफ माना जा सकता है।

सरकार से संतुलित समाधान की अपील

संगठन ने मदरसा संचालकों, उलेमा और विद्यार्थियों से अपील की है कि वे स्थिति को लेकर संयम बनाए रखें। साथ ही सरकार से आग्रह किया गया है कि ऐसा समाधान निकाला जाए जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकार और शिक्षा व्यवस्था के बीच संतुलन बना रहे।

अन्य संगठनों ने भी जताई चिंता

इस मुद्दे पर मुस्लिम सेवा संगठन ने भी चिंता व्यक्त की है, संगठन अध्यक्ष नईम कुरैशी ने जिलाधिकारी के माध्यम से सरकार को पत्र सौंपते हुए कहा कि मदरसे केवल धार्मिक शिक्षा नहीं देते, बल्कि नैतिक मूल्य, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी भी विकसित करते हैं।

संगठन के उपाध्यक्ष आकिब कुरैशी ने कहा कि यदि किसी व्यवस्था में कमी है तो उसे सुधारने की जरूरत है, न कि पूरी प्रणाली को समाप्त करने की उन्होंने सरकार से मांग की कि विद्यार्थियों की शिक्षा प्रभावित किए बिना सुधारात्मक कदम उठाए जाएं, फिलहाल मदरसा बोर्ड समाप्त करने के फैसले पर विवाद जारी है और विभिन्न संगठन सरकार से पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं, अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार इस मामले में आगे क्या रुख अपनाती है और न्यायालय के अंतिम निर्णय तक स्थिति क्या रहती है।

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