कांग्रेस नेता राहुल गांधी की बढ़ती सक्रियता और बदलते राजनीतिक हालात के बीच भाजपा ने पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देकर सियासी संदेश देने की कोशिश की है। राहुल गांधी के खिलाफ आक्रामक तेवरों के लिए पहचानी जाने वाली स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महामंत्री बनाया जाना महज संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।स्मृति ईरानी लंबे समय तक अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ भाजपा का सबसे मुखर चेहरा रही हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें राहुल गांधी के मुकाबले मैदान में उतारा था। चुनाव भले ही स्मृति हार गईं, लेकिन अमेठी में उनकी सक्रियता ने गांधी परिवार के गढ़ में भाजपा की मौजूदगी को मजबूत करने का काम किया। इसके बाद 2019 में राहुल गांधी को अमेठी में हराकर स्मृति ईरानी ने देश की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाई।यही वजह है कि भाजपा में स्मृति ईरानी को राहुल गांधी और गांधी परिवार के खिलाफ सबसे प्रभावी राजनीतिक जवाब के तौर पर देखा जाता रहा है।
वह राहुल गांधी पर सीधे हमले करने से कभी पीछे नहीं हटीं और कई मौकों पर अपने आक्रामक अंदाज को लेकर आलोचनाओं का भी सामना किया। बावजूद इसके भाजपा नेतृत्व ने उनकी राजनीतिक उपयोगिता को लगातार महत्व दिया।2014 की हार के बाद केंद्र में मंत्री पद और 2019 में अमेठी की ऐतिहासिक जीत ने स्मृति ईरानी के राजनीतिक कद को लगातार बढ़ाया। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के केएल शर्मा ने उन्हें अमेठी में हरा दिया। कांग्रेस ने इस जीत को राहुल गांधी की 2019 की हार का बदला बताने की कोशिश की। इसके बाद कुछ समय तक स्मृति ईरानी की अमेठी में सक्रियता अपेक्षाकृत कम दिखाई दी, जिससे राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी होने लगी कि अमेठी की राजनीति में उनका प्रभाव कमजोर पड़ गया है।लेकिन अब तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। संगठन में राष्ट्रीय स्तर की बड़ी जिम्मेदारी मिलने के बाद स्मृति ईरानी की भूमिका केवल अमेठी तक सीमित नहीं रहने वाली है। भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर जमीन पर अपनी तैयारियां तेज कर रही है और ऐसे में स्मृति ईरानी का अनुभव पार्टी के लिए खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अमेठी की राजनीतिक भौगोलिक स्थिति भी स्मृति की संभावित भूमिका को खास बनाती है। अमेठी लोकसभा क्षेत्र में पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें सलोन सुरक्षित विधानसभा रायबरेली जिले का हिस्सा है, जबकि जगदीशपुर विधानसभा क्षेत्र का हलियापुर क्षेत्र सुलतानपुर से जुड़ा हुआ है। ऐसे में अमेठी को केंद्र बनाकर स्मृति ईरानी की सक्रियता का असर रायबरेली और सुलतानपुर की राजनीति पर भी पड़ सकता है।2014 से 2024 के बीच स्मृति ईरानी ने अमेठी के गांवों और बूथ स्तर तक भाजपा का नेटवर्क मजबूत करने के लिए लगातार काम किया। चुनावी हार के बावजूद इन इलाकों में उनके संपर्क और संगठनात्मक प्रभाव को पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता। यही नेटवर्क 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।स्मृति ईरानी की नई जिम्मेदारी को इसी व्यापक रणनीति के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है।
राहुल गांधी की बढ़ती सक्रियता के बीच भाजपा ने ऐसा चेहरा आगे किया है, जो राजनीतिक हमलों का जवाब उसी आक्रामक अंदाज में देने के लिए जाना जाता है।अमेठी में 2024 का चुनाव स्मृति ईरानी हार जरूर गईं, लेकिन उनकी राजनीतिक कहानी वहीं खत्म नहीं हुई। अब संगठन में नई भूमिका के साथ उनकी वापसी यह संकेत दे रही है कि भाजपा उन्हें सिर्फ अमेठी की पूर्व सांसद के तौर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी और कांग्रेस की राजनीति के मुकाबले एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में है।2027 के विधानसभा चुनाव से पहले स्मृति ईरानी की यह नई भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेठी, रायबरेली और सुलतानपुर की राजनीति में उनकी सक्रियता भाजपा के लिए कांग्रेस के प्रभाव क्षेत्र में सीधी चुनौती बन सकती है। चुनावी हार के बाद किसी नेता को संगठन में और बड़ी जिम्मेदारी मिलना अपने आप में संदेश है—स्मृति ईरानी की राजनीतिक पारी अभी खत्म नहीं हुई है, बल्कि भाजपा ने उन्हें एक नए मोर्चे पर उतार दिया है।