लखनऊ: कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘पितृसत्ता को खत्म करने’ वाले बयान पर उत्तर प्रदेश के पूर्व एमएलसी बृजेश सिंह ने तीखा पलटवार किया है। बृजेश सिंह ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए राहुल गांधी के बयान पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर महिलाओं की समानता और अधिकारों की लड़ाई किसी सिद्धांत का हिस्सा है, तो इसे किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने हिंदू समाज में हुए सामाजिक सुधारों और शाह बानो मामले का हवाला देते हुए राहुल गांधी के रुख को विरोधाभासी बताया।
बृजेश सिंह ने अपनी पोस्ट की शुरुआत यह कहते हुए की कि वह पहली बार किसी राजनीतिक मुद्दे पर बोल रहे हैं, क्योंकि मामला धर्म से जुड़ा है। उन्होंने राहुल गांधी को संबोधित करते हुए कहा कि बार-बार ‘स्मैश द पैट्रिआर्की’ की बात करना और अधिकांश आलोचना हिंदू सामाजिक रीति-रिवाजों पर केंद्रित करना अपने आप में एक विरोधाभास है। पूर्व एमएलसी ने कहा कि हिंदू समाज ने पिछले एक सदी से अधिक समय में कई पितृसत्तात्मक और भेदभावपूर्ण परंपराओं में सुधार किया है। उन्होंने सती प्रथा के उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता, बाल विवाह पर रोक और हिंदू विवाह अधिनियम जैसे कानूनों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार कानून में बदलाव के बाद बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार मिला, जबकि दहेज और घरेलू हिंसा के खिलाफ भी कानूनी प्रावधान बनाए गए।
बृजेश सिंह ने कहा कि इन सुधारों से हिंदू समाज खत्म नहीं हुआ, बल्कि यह साबित हुआ कि कोई भी समाज अपनी परंपराओं पर सवाल उठाकर समय के साथ बदलाव कर सकता है। उनके मुताबिक, महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक सुधारों को धर्म के आधार पर अलग-अलग नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
इसी क्रम में बृजेश सिंह ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाएं भी उतनी ही भारतीय महिलाएं हैं और यदि पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष को वास्तविक सिद्धांत माना जाता है, तो मुस्लिम समाज में महिलाओं की समानता, स्वायत्तता, विवाह, तलाक, विरासत और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े सवालों पर भी उतनी ही मजबूती से बात होनी चाहिए।
अपनी पोस्ट में उन्होंने 1985 के शाह बानो मामले का भी जिक्र किया। बृजेश सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो के गुजारा-भत्ते के पक्ष में फैसला दिया था, लेकिन इसके बाद राजनीतिक और धार्मिक विरोध के बीच तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम बनाया। उन्होंने इस घटनाक्रम को महिलाओं के अधिकारों और राजनीतिक मजबूरियों के बीच टकराव का उदाहरण बताया। बृजेश सिंह ने कहा कि पितृसत्ता किसी धर्म या समुदाय के भीतर मौजूद हो तो उसे केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उस पर सवाल उठाना राजनीतिक रूप से मुश्किल है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि महिलाओं के अधिकारों का पैमाना सभी समुदायों के लिए समान होना चाहिए।
उन्होंने राहुल गांधी के ‘स्मैश द पैट्रिआर्की’ नारे पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर यह वास्तव में सिद्धांत है तो इसे चुनिंदा तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। बृजेश सिंह के मुताबिक, एक सच्चा नेता महिलाओं की समानता, स्वतंत्रता और सम्मान के मुद्दे पर सिद्धांत आधारित रुख अपनाता है, भले ही ऐसा करना राजनीतिक रूप से असहज या नुकसानदेह क्यों न हो।
बृजेश सिंह की इस टिप्पणी के बाद राहुल गांधी के ‘पितृसत्ता’ वाले बयान को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। अब यह मामला केवल महिला अधिकारों तक सीमित न रहकर धर्म, सामाजिक सुधार और राजनीतिक नेतृत्व के रुख से भी जुड़ता नजर आ रहा है।
