संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर उठे विवाद ने अब सड़कों से निकलकर जेल और जनभावनाओं तक आग लगा दी है।
ग्वालियर में आंबेडकर का पोस्टर जलाने के मामले में कार्रवाई तो हुई, लेकिन इस कार्रवाई ने अब एक नया सवाल खड़ा कर दिया है क्या कानून सबके लिए बराबर है, या फिर कुछ मामलों में तराजू का पलड़ा जानबूझकर झुका दिया जाता है? डॉ. भीमराव आंबेडकर का पोस्टर जलाने के मामले में ग्वालियर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अनिल मिश्रा और उनके तीन साथियों को बड़ा झटका लगा है।

कोर्ट ने सभी की जमानत याचिका खारिज कर दी है और उन्हें जेल भेज दिया गया है। देर रात पुलिस ने इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अनिल मिश्रा को उनके तीन साथियों के साथ गिरफ्तार किया था। पुलिस का आरोप है कि आंबेडकर के पोस्टर जलाने की घटना से सामाजिक सौहार्द बिगड़ सकता था, इसी आधार पर सख्त कार्रवाई की गई। बताया जा रहा है कि अनिल मिश्रा बीते कुछ समय से मनुस्मृति जलाने के विरोध में खुलकर सामने आ रहे थे और इसी क्रम में उनके बयान और गतिविधियां लगातार विवादों में थीं। आंबेडकर को लेकर की गई उनकी टिप्पणियों के बाद ग्वालियर से लेकर भोपाल तक माहौल गरमाता चला गया, और अंततः पुलिस ने कार्रवाई की।
अनिल मिश्रा की गिरफ्तारी के बाद मामला शांत होने के बजाय और भड़क गया है। सोशल मीडिया और कई मीडिया प्लेटफॉर्म पर लोग मध्यप्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री मोहन यादव पर सवाल उठा रहे हैं। लोगों का सीधा सवाल है— “जब संतोष वर्मा जैसे लोग ब्राह्मण बेटियों को गालियां देते हैं, तब न सस्पेंशन होता है और न ही कोई ठोस कार्रवाई, तो फिर अनिल मिश्रा पर इतनी सख्ती क्यों?” यही सवाल अब जनाक्रोश का रूप लेता दिख रहा है।ट्विटर #BJP_Anti_Hindu ट्रेंड करने लगा है।कई यूज़र्स दावा कर रहे हैं कि—जो लोग राम का विरोध करते हैं,,जो सनातन धर्म पर टिप्पणी करते हैं जो खुलेआम मनुस्मृति जलाते हैं,,उन पर वैसी सख्त कार्रवाई क्यों नहीं होती, जैसी अनिल मिश्रा पर की गई? लोग इसे सेलेक्टिव एक्शन बता रहे हैं और सवाल पूछ रहे हैं कि क्या आस्था, विचार और विरोध की एक सीमा सिर्फ कुछ लोगों के लिए तय की गई है? इस पूरे घटनाक्रम के बीच अनिल मिश्रा का बयान भी सामने आया है।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि— “मैं अपने कदम पीछे नहीं हटाऊंगा। यह सिर्फ मेरी गिरफ्तारी नहीं है, यह विचारों की लड़ाई है।” उनके समर्थकों का कहना है कि अब यह मामला सिर्फ एक गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि विचारधाराओं की टकराहट बन चुका है।अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या बीजेपी सरकार इस कार्रवाई पर कायम रहेगी? या फिर बढ़ते जनदबाव के बीच कोई नया रुख अपनाएगी? और सबसे अहम—आम जनता किसके साथ खड़ी होगी?





