साइबर सुरक्षा के घेरे में यूपी के विधायक, सोशल मीडिया पर संयम से लेकर डिजिटल ठगी से बचाव तक की सीखडिजिटल दौर में जनप्रतिनिधियों की भूमिका अब विधानसभा और क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गई है। सोशल मीडिया जनता से संवाद का बड़ा माध्यम बन चुका है, लेकिन इसके साथ साइबर अपराध, फर्जी अकाउंट, डेटा चोरी, डिजिटल ठगी और ऑनलाइन छवि को नुकसान पहुंचाने जैसी चुनौतियां भी लगातार बढ़ी हैं।
इसी बदलते डिजिटल परिदृश्य को देखते हुए लखनऊ में उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्यों के लिए आयोजित “साइबर सुरक्षा : ए डिजिटल सिक्योरिटी ब्रीफिंग फॉर लेजिस्लेटर्स” कार्यक्रम का दूसरा दिन बेहद महत्वपूर्ण रहा।होटल सेन्ट्रम में आयोजित कार्यक्रम में विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना की मौजूदगी में विधायकों को साइबर सुरक्षा और सोशल मीडिया के सुरक्षित एवं जिम्मेदार इस्तेमाल की जानकारी दी गई। साइबर विशेषज्ञ अमित दुबे ने सदस्यों को डिजिटल दुनिया में मौजूद खतरों से परिचित कराया और उनसे बचाव के व्यावहारिक उपाय बताए।कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू सोशल मीडिया को लेकर विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना की सलाह रही। उन्होंने जनप्रतिनिधियों से अपील की कि सोशल मीडिया पर आने वाली प्रतिक्रियाओं से प्रभावित होकर अपने मूल स्वभाव और कार्यशैली में बदलाव न करें। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में धैर्य और संयम बेहद जरूरी है। कुछ नकारात्मक टिप्पणियां किसी जनप्रतिनिधि के काम और जनसेवा के संकल्प को प्रभावित नहीं करनी चाहिए।सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और नकारात्मक टिप्पणियां आज राजनीतिक जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। ऐसे में अध्यक्ष की सलाह का संदेश साफ था कि जनप्रतिनिधियों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रतिक्रिया देने से पहले संयम और विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।

सोशल मीडिया को केवल प्रचार का माध्यम बनाने के बजाय जनता से संवाद और अपनी बात प्रभावी ढंग से रखने के मंच के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।कार्यशाला में साइबर अपराधों से बचाव पर भी विस्तार से चर्चा हुई। विधायकों को फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट, संदिग्ध लिंक, डिजिटल ठगी और ऑनलाइन पहचान की सुरक्षा जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण जानकारी दी गई। व्यक्तिगत और गोपनीय जानकारी साझा करने में सावधानी बरतने तथा अनजान लिंक पर क्लिक न करने जैसी बुनियादी सावधानियों को भी विशेष रूप से रेखांकित किया गया।कार्यक्रम में विधायकों ने भी साइबर सुरक्षा से जुड़े सवाल पूछे। फर्जी खातों से लेकर नकारात्मक टिप्पणियों और डिजिटल फ्रॉड तक, सदस्यों ने अपनी व्यावहारिक समस्याएं विशेषज्ञ के सामने रखीं और उनके समाधान समझे। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जनप्रतिनिधियों के सोशल मीडिया अकाउंट अब केवल व्यक्तिगत प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि सार्वजनिक संवाद और राजनीतिक संचार का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं।

कार्यशाला में एक अहम निर्णय यह भी लिया गया कि साइबर सुरक्षा और सोशल मीडिया के सुरक्षित एवं जिम्मेदार इस्तेमाल को लेकर एक एसओपी यानी Standard Operating Procedure तैयार की जाएगी। यह एसओपी सभी विधायकों को उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि डिजिटल प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल के दौरान आवश्यक सावधानियों और सुरक्षा उपायों को व्यवहार में लागू किया जा सके।कार्यक्रम में कैबिनेट मंत्री दयाशंकर सिंह, राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार गिरीश चंद्र यादव सहित कई विधायक मौजूद रहे। शलभ मणि त्रिपाठी, अभय सिंह, रमेश जायसवाल और सुचिस्मिता मौर्या ने भी अपने विचार रखे। बड़ी संख्या में अन्य सदस्यों ने भी कार्यशाला में सहभागिता की।दरअसल, साइबर सुरक्षा अब सिर्फ तकनीकी विशेषज्ञों का विषय नहीं रह गई है। जिस तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म राजनीतिक संवाद, जनसंपर्क और सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन रहे हैं, उसी तेजी से जनप्रतिनिधियों के लिए डिजिटल सतर्कता भी जरूरी होती जा रही है। एक गलत क्लिक, संदिग्ध लिंक या असावधानी से साझा की गई जानकारी गंभीर समस्या पैदा कर सकती है।लखनऊ में आयोजित यह कार्यशाला इसी बदलती चुनौती की ओर संकेत करती है। विधायकों को साइबर अपराध से बचाने के साथ-साथ सोशल मीडिया पर संयमित, सकारात्मक और जिम्मेदार व्यवहार के लिए तैयार करना लोकतांत्रिक संवाद को भी मजबूत कर सकता है। डिजिटल दौर में जनप्रतिनिधियों के लिए संदेश स्पष्ट है—सोशल मीडिया पर सक्रिय रहिए, लेकिन सतर्क रहिए; अपनी बात मजबूती से रखिए, लेकिन संयम के साथ।