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डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरू सरकार की तुष्टिकरण नीति के खिलाफ किया था शंखनाद : मुख्यमंत्री योगी

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लखनऊ, 6 जुलाई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उन्होंने देश की एकता और अखंडता के लिए नेहरू सरकार की तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ शंखनाद किया था। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2019 में अनुच्छेद-370 हटाकर डॉ. मुखर्जी के सपने को साकार किया गया और जम्मू-कश्मीर में बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के संविधान को पूरी तरह लागू किया गया।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को सिविल अस्पताल स्थित डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण और पुष्पांजलि अर्पित की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी भारत माता के महान सपूत, प्रखर स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद् और राष्ट्रवादी विचारक थे, जिन्होंने राष्ट्रहित को हमेशा सर्वोपरि रखा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि देश के विभाजन के समय जब पूरे बंगाल को पाकिस्तान में शामिल करने की कोशिशें हो रही थीं, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उसके खिलाफ मजबूती से खड़े हुए। उन्होंने कहा कि आज पश्चिम बंगाल भारत का अभिन्न हिस्सा है तो उसमें डॉ. मुखर्जी के संघर्ष और योगदान की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

सीएम योगी ने कहा कि स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में डॉ. मुखर्जी ने खाद्य और औद्योगिक नीतियों को दिशा दी, लेकिन जब उन्हें लगा कि नेहरू सरकार की तुष्टिकरण की नीति देश की अखंडता के लिए खतरा बन रही है, तो उन्होंने सत्ता छोड़ने में भी संकोच नहीं किया। बाद में भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे” का उद्घोष करते हुए जम्मू-कश्मीर की परमिट व्यवस्था का विरोध किया। इसी आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और वर्ष 1953 में कश्मीर में उनका निधन हो गया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि डॉ. मुखर्जी जिस पश्चिम बंगाल को पाकिस्तान में जाने से बचाने के लिए संघर्षरत रहे, आज उसी राज्य में भाजपा एक मजबूत राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित है। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण और पुनरुद्धार का कार्य भी किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1901 में जन्मे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कम उम्र में ही शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं। मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति बने और शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

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