रायपुर: योग गुरु बाबा रामदेव ने हालिया आंदोलनों और विरोध-प्रदर्शनों में बच्चों की भागीदारी को लेकर चिंता जताई है। रायपुर में मीडिया से बातचीत के दौरान रामदेव ने कहा कि छोटे बच्चों को आंदोलनों का हिस्सा बनाने के बजाय उनकी पढ़ाई, स्वास्थ्य और भविष्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए।रामदेव ने कहा कि देश में हिंदू, मुसलमान, सिख, जैन, बौद्ध या किसी जाति-वर्ग के लोग खतरे में नहीं हैं। उनके मुताबिक, असली चिंता देश के बचपन, युवाओं, वर्तमान और भविष्य को लेकर होनी चाहिए।
‘बच्चों को आंदोलन में क्यों धकेला जा रहा?’
बाबा रामदेव ने बच्चों को विरोध-प्रदर्शनों से दूर रखने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस उम्र में बच्चों को स्कूल जाकर पढ़ाई करनी चाहिए, उस उम्र में उन्हें आंदोलन और प्रदर्शन में शामिल करना कितना उचित है।उनका कहना था कि छोटे बच्चों को कई बार यह भी पता नहीं होता कि आंदोलन किस मुद्दे को लेकर हो रहा है। ऐसे में उन्हें किसी प्रदर्शन या घेराव का हिस्सा बनाना उनकी शिक्षा और मानसिक विकास पर असर डाल सकता है।रामदेव के मुताबिक बच्चों की प्राथमिकता शिक्षा, संस्कार, स्वास्थ्य और बेहतर भविष्य होनी चाहिए, न कि राजनीतिक या सामाजिक संघर्षों में भागीदारी।
‘न हिंदू खतरे में, न मुसलमान’
बाबा रामदेव ने ‘कौन खतरे में है’ की बहस पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि देश में हिंदू, मुसलमान, सिख, जैन और बौद्ध समेत विभिन्न जाति-वर्ग के लोगों को खतरे में बताने के बजाय देश के बच्चों और युवाओं के भविष्य पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने बचपन और जवानी को देश की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी बताते हुए कहा कि देश के वर्तमान और भविष्य को लेकर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
संविधान और लोकतंत्र के लिए आंदोलन का समर्थन
रामदेव ने आंदोलन करने के लोकतांत्रिक अधिकार को पूरी तरह खारिज नहीं किया। उन्होंने कहा कि संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए आंदोलन होना चाहिए, लेकिन विरोध का तरीका संवैधानिक और शांतिपूर्ण होना जरूरी है।
उनकी आपत्ति खास तौर पर अराजकता और हिंसक तरीके से होने वाले आंदोलनों तथा उनमें बच्चों की भागीदारी को लेकर है।
यानी रामदेव का संदेश यह है कि नागरिक अपनी मांगों और समस्याओं को लोकतांत्रिक तरीके से उठा सकते हैं, लेकिन आंदोलन में हिंसा या बच्चों के इस्तेमाल से बचना चाहिए।
युवाओं के रोजगार और भर्ती के मुद्दे पर भी चिंता
रामदेव की ताजा टिप्पणी को युवाओं से जुड़े रोजगार और सरकारी भर्ती के मुद्दों पर उनकी पिछली चिंताओं के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
हाल के समय में पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितता, सरकारी नौकरी और रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं में नाराजगी देखने को मिली है। ऐसे मुद्दों को गंभीरता से लेने और व्यवस्था में सुधार की जरूरत पर भी रामदेव अपनी राय जाहिर कर चुके हैं।उनका कहना है कि यदि युवाओं को लगातार अन्याय या भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा तो उनके भीतर असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है।
‘बचपन बचाना सबसे बड़ा मुद्दा’
रामदेव ने देश के बचपन को बचाने को महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। उनका कहना है कि कम उम्र में बच्चों को राजनीतिक या सामाजिक संघर्षों में शामिल करने से उनकी पढ़ाई और मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है।बच्चों को सुरक्षित वातावरण और बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना समाज की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसी वजह से उन्होंने आंदोलनों में बच्चों की भागीदारी पर सवाल उठाया।
रामदेव के बयान का असली फोकस क्या है?
सोशल मीडिया पर रामदेव के बयान को अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक नजरिए से देखा जा सकता है, लेकिन उनके बयान का मुख्य फोकस बच्चों, युवाओं, लोकतांत्रिक आंदोलनों और देश के भविष्य पर रहा।यह कहना सही नहीं होगा कि उन्होंने आंदोलनों का पूरी तरह विरोध किया। उन्होंने संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए आंदोलन की जरूरत को स्वीकार किया, लेकिन आंदोलन के तरीके और उसमें बच्चों की भूमिका पर सवाल उठाया।इसी तरह ‘न हिंदू खतरे में, न मुसलमान’ वाली टिप्पणी को भी उनके व्यापक संदेश के संदर्भ में देखना जरूरी है, जिसमें उन्होंने धार्मिक और जातीय पहचान से ऊपर उठकर देश के बच्चों और युवाओं के भविष्य को प्राथमिकता देने की बात कही।
बच्चों की सुरक्षा और युवाओं के मुद्दे, दोनों जरूरी
बाबा रामदेव के बयान ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि क्या बच्चों को आंदोलनों में शामिल किया जाना चाहिए? एक तरफ बच्चों को राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों से दूर रखकर उनकी शिक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है, तो दूसरी तरफ युवाओं से जुड़े रोजगार, भर्ती और परीक्षा व्यवस्था के वास्तविक मुद्दों का समाधान भी जरूरी है।रामदेव की टिप्पणी का व्यापक संदेश यही है कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाई जा सकती है, लेकिन बच्चों को ऐसे संघर्षों से दूर रखना चाहिए और देश के युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों को गंभीरता से संबोधित करना चाहिए।