नितिन नवीन ने अपनी नई टीम का ऐलान कर दिया है। इस टीम योगी आदित्यनाथ और यूपी का दब दबा साफतौर दिखाई दे रहा है। सियासी गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि दिल्ली हाई कमान ने असंतोष सुलझाने और 2027 के चुनाव को जीतने का नया फॉर्मूला खोज निकाला है।
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एक तरफ जहाँ संगठन में असंतुष्ट या अलग-थलग पड़े बड़े चेहरों को राष्ट्रीय स्तर पर जगह देकर संतुलित करने का प्रयास किया गया है, वहीं दूसरी तरफ यह संदेश भी पूरी तरह साफ कर दिया गया है कि 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे और उनके नेतृत्व पर ही लड़ा जाएगा। नितिन नवीन की नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी पर नजर डालें तो इसमें संतुलन और भावी रणनीति का स्पष्ट मेल दिखता है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर संगठन में जिम्मेदारी दी गई है, जिसे जानकार लंबे समय से असहज चल रहे नेताओं को साधने की रणनीति बता रहे हैं। इसके अलावा, नई टीम में उत्तर प्रदेश का भारी दबदबा देखने को मिला है। रेखा वर्मा और डॉ. तारिक मंसूर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है, जबकि केंद्र सरकार से दूरी के बाद स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। उनके साथ ब्राह्मण चेहरे के रूप में हरीश द्विवेदी को महामंत्री और डॉ. भोला सिंह व संगीता यादव को राष्ट्रीय मंत्री के पद से नवाजा गया है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि जब पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश बीजेपी की कमान सौंपी गई थी, तब कयास लगाए जा रहे थे कि दिल्ली हाई कमान इसके जरिए सीएम योगी पर नियंत्रण बनाना चाहता है। लेकिन समय बीतने के साथ समीकरण पूरी तरह बदल गए।

हाल ही में नितिन नवीन के लखनऊ दौरे और उसके बाद दिल्ली में यूपी के सांसदों के साथ हुई सीक्रेट बैठकों ने तस्वीर साफ कर दी है। सांसदों की रिपोर्ट के मुताबिक जमीनी स्तर पर योगी आदित्यनाथ का ‘लॉ एंड ऑर्डर’ और उनकी हिंदुत्ववादी छवि आज भी जनता के बीच बेहद मजबूत है। बृजभूषण शरण सिंह जैसे दिग्गज नेताओं ने भी खुलकर माना है कि 2022 की जीत योगी के चेहरे पर हुई थी और 2027 में भी वही एकमात्र विकल्प हैं। सूत्रों की मानें तो दिल्ली ने पहले केंद्रीय चेहरे पर चुनाव लड़ने का विचार किया था, लेकिन बदली परिस्थितियों और जनभावनाओं को देखते हुए अब पूरा दारोमदार योगी के लोकप्रिय चेहरे पर ही टिका है। हालांकि, संगठन का साथ और चेहरा तय होने के बावजूद योगी आदित्यनाथ के लिए 2027 की राह आसान नहीं है। विरोधी दल सरकार पर हावी होने की ताक में हैं और योगी के सामने अपनी साख बचाने की पाँच मुख्य चुनौतियाँ खड़ी हैं,,पेपर लीक व भर्ती परीक्षाओं में हो रही धांधली से युवाओं में उपजे असंतोष को दूर कर उनका विश्वास बहाल करना। दूसरा राम मंदिर से जुड़े हालिया विवादों और विरोधियों के राजनीतिक हमलों का करारा जवाब देना। तीसरा यूजीसी (UGC) व अन्य प्रशासनिक मुद्दों से उपजी ब्राह्मण कक्षत्रियों की नाराजगी को दूर करना। चौथा हिंदुत्व के एजेंडे के साथ-साथ पिछड़े और दलित समाज को अपने पाले में एकजुट रखना। और पांचवा चुनाव में टिकट कटने के डर से सक्रिय अपनी ही पार्टी के भीतरी विरोधियों और मजबूत होती विपक्षी घेराबंदी से निपटना होगा । उत्तर प्रदेश का 2027 का चुनाव सिर्फ राज्य की सत्ता का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक भविष्य की दिशा भी तय करेगा। यदि योगी इन सभी चुनौतियों को पार पाकर बीजेपी को दोबारा पूर्ण बहुमत दिलाते हैं, तो पार्टी के भीतर उनका कद और पद अभूतपूर्व ऊंचाई पर पहुंच जाएगा। वहीं दूसरी ओर, विरोधी जानते हैं कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है—इसीलिए योगी को रोकने के लिए चौतरफा रणनीति बनाई जा रही है। यही वजह है कि योगी आदित्यनाथ भी 2027 के इस महासंग्राम के लिए अपना हर कदम बेहद फूंक-फूंक कर रख रहे हैं।