यूजीसी को लेकर देश में उठी आग अब थमने का नाम नहीं ले रही है, बल्कि दिन-ब-दिन और ज्यादा भड़कती हुई दिखाई दे रही है। महिपाल सिंह मकराना को आंदोलन करते हुए आज चार दिन हो चुके हैं और उनका काफिला हरियाणा से होते हुए चंडीगढ़ की तरफ बढ़ चुका है। हाथों में मशाल है, आंखों में उबाल है और शब्दों में साफ ललकार है—अपने बच्चों के भविष्य के लिए अब पीछे नहीं हटेंगे!जी हां, सामान्य वर्ग के लोग लगातार सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं और उनका कहना है कि जब तक सरकार इस कानून को वापस नहीं लेती, तब तक उनका आंदोलन खत्म नहीं होगा। वहीं अब आरक्षण हटाओ, देश बचाओ आंदोलन का भी काउंटडाउन शुरू हो चुका है।
ALSO READ योगी के सहारे BJP की हैट्रिक! तावड़े की एंट्री से 200 विधायकों पर गिरी टिकट की गाज !

21 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर हर्ष दुबे और आदित्य राज सिंह के नेतृत्व में बड़ी संख्या में सामान्य वर्ग के लोगों के जुटने का दावा किया जा रहा है। यानी एक तरफ मकराना की यात्रा आगे बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ दिल्ली में होने वाले आंदोलन की तैयारी तेज हो चुकी है। और यही वजह है कि अब इस पूरे आंदोलन पर सरकार की नजरें भी टिक गई हैं। क्योंकि मामला सिर्फ आज के आंदोलन का नहीं है। 2027 में कई राज्यों में चुनाव होने हैं और उसके बाद 2029 में लोकसभा चुनाव। ऐसे में अगर सामान्य वर्ग की नाराजगी लगातार बढ़ती रही तो इसका राजनीतिक असर पड़ना तय माना जा रहा है। बीजेपी के लिए यह चिंता इसलिए भी बड़ी है क्योंकि जिन लोगों की नाराजगी सामने आ रही है, उन्हें लंबे समय से बीजेपी का मजबूत समर्थक माना जाता रहा है। यही वजह है कि सवाल उठ रहा है कि क्या यह नाराजगी आने वाले चुनाव में बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है? इसी बीच 23 अगस्त को दिल्ली के शाह ऑडिटोरियम में सवर्ण महापंचायत का भी ऐलान हो चुका है। राज सिंह शेखावत 15 हजार किलोमीटर की वाहन यात्रा के जरिए सामान्य वर्ग के लोगों से संपर्क कर रहे हैं और उन्हें दिल्ली पहुंचने का निमंत्रण दे रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह जैसे बड़े नेता साफ कह चुके हैं कि आरक्षण खत्म नहीं किया जाएगा और न ही इसमें कोई बदलाव किया जाएगा। विपक्ष की तरफ से भी सामान्य वर्ग को कोई बड़ा राजनीतिक भरोसा मिलता दिखाई नहीं दे रहा है। राहुल गांधी हों, अखिलेश यादव हों, चंद्रशेखर आजाद हों या मायावती—फिलहाल कोई भी नेता खुलकर इस आंदोलन के साथ खड़ा नजर नहीं आ रहा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या सामान्य वर्ग की यह नाराजगी सिर्फ सड़कों तक सीमित रहेगी, या फिर 21 अगस्त और 23 अगस्त के बाद यह नाराजगी चुनावी मैदान तक पहुंचेगी? क्योंकि अब दिल्ली की तरफ बढ़ती इन आवाजों पर सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं।