“अगर दिल्ली की कुर्सी पर बने रहना है… तो लखनऊ का किला फतह करना ही होगा!” नितिन नवीन ने जैसे ही अपनी नई टीम का ऐलान किया, पूरे यूपी के राजनीतिक गलियारों में एक ज़बरदस्त घमासान छिड़ चुका है! सवाल उठ रहे हैं कि क्या विनोद तावड़े में वो दम-खम है जो बीजेपी को उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सत्ता के शिखर पर बैठा सके? क्या तावड़े ने 2027 की जीत का कोई गुप्त ‘मास्टर फॉर्मूला’ सेट कर लिया है? वजह बिल्कुल साफ है—2027 की राह इस बार बीजेपी के लिए उतनी आसान नहीं दिख रही। एक तरफ ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज में अंदरूनी नाराजगी की सुगबुगाहट है, तो दूसरी तरफ पेपर लीक के मुद्दे को लेकर युवाओं का गुस्सा चरम पर है। ऊपर से सालों की सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency)! इसी बीच एक ऐसी खुफिया रिपोर्ट सामने आई है जिसने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक खलबली मचा दी है…
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खबर है कि बीजेपी 2027 में अपने करीब 200 मौजूदा विधायकों के टिकट काटने की तैयारी कर रही है! ऐसे नाजुक मोड़ पर बीजेपी हाईकमान ने यूपी जैसे सबसे बड़े राजनीतिक समर की कमान सौंपी है विनोद तावड़े को! तावड़े को चुनावी रणनीति और संगठन मैनेजमेंट का पुराना उस्ताद माना जाता है। बिहार में जब परिस्थितियां खिलाफ थीं, तब तावड़े ने ही पर्दे के पीछे रहकर ऐसी गोटियां बिछाईं कि बीजेपी ने भारी एंटी-इन्कंबेंसी के बावजूद सरकार बना ली। लेकिन यूपी का मैदान अलग है। 2022 में बीजेपी ने अकेले 255 सीटें जीती थीं और सहयोगियों—अपना दल (S) और निषाद पार्टी के साथ आंकड़ा 273 तक पहुँचाया था। इस बार विनोद तावड़े, पंकज चौधरी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दिल्ली हाईकमान को एक साथ मिलकर एक ऐसा बैलेंस बनाना होगा, जहाँ टिकट बंटवारे में जातीय समीकरण—सामान्य, ओबीसी और दलित—तीनों को साधते हुए 200 नए चेहरों को मैदान में उतारा जा सके। लेकिन सूत्र कहते हैं कि संगठन का प्रभारी चाहे कोई भी बने, प्रदेश अध्यक्ष कोई भी रहे… 2027 का असली महासंग्राम सिर्फ और सिर्फ एक ही लड़ाई होगी—योगी आदित्यनाथ वर्सेस अखिलेश यादव! और इस वक्त इस सियासी दंगल में योगी आदित्यनाथ अपने विरोधियों पर भारी पड़ते दिख रहे हैं! जहाँ एक तरफ अखिलेश यादव ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा देकर जातियों में वोट बैंक तलाश रहे हैं… वहीं दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ का रुख बिल्कुल साफ है—”बाटोगे तो काटोगे!” अखिलेश यादव को बोलते वक्त हर शब्द तोल-मोल कर बोलना पड़ता है—उन्हें यह देखना है कि पिछड़ा और दलित भी न रूठे, ब्राह्मण भी नाराज न हो और उनका कोर एम-वाई (M-Y) समीकरण भी खिसके न! इसी उधेड़बुन में वो खुलकर बोलने से कतराते हैं। इसके उलट, योगी आदित्यनाथ किसी जातिगत जोड़-तोड़ में पड़े बिना सीधे ‘सनातन’ और ‘हिंदू एकता’ का आह्वान करते हैं। उनके भाषणों में राष्ट्रधर्म, यूपी का विकास और “माफियाओं को मिट्टी में मिला देने” का साफ-सुथरा रौद्र रूप दिखता है, जो सीधे जनता के दिलों पर प्रहार करता है!

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि अगर ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज अपनी छोटी-मोटी नाराजगी को भूलकर एक बार फिर बीजेपी के साथ मजबूती से खड़ा हो गया, तो योगी को हैट्रिक लगाने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती! इतिहास गवाह है—योगी आदित्यनाथ जब दूसरे राज्यों में चुनाव प्रचार करने जाते हैं, तो जहाँ-जहाँ उनकी जनसभाएं होती हैं, वहाँ बीजेपी का स्ट्राइक रेट 90% से ऊपर रहता है! अब तो खुद उनके अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव है… सोचिए, जनता अब योगी का असली और प्रचंड रूप देखने वाली है! अब इस पूरी खबर का निष्कर्ष क्या है तो वो भी आप जान लीजिये 200 विधायकों की छुट्टी, नए चेहरों पर दांव, विनोद तावड़े की रणनीति और योगी आदित्यनाथ का ब्रांड हिंदुत्व… क्या बीजेपी 2027 में इतिहास रचेगी? या अखिलेश का ‘PDA’ दांव बाजी मार जाएगा?