पूर्व मंत्री आजम खां और उनके परिजनों द्वारा संचालित जौहर ट्रस्ट की प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में कई अहम जानकारियां सामने आई हैं। जांच के दौरान पता चला है कि लखनऊ, दिल्ली, नोएडा और मुंबई के कुछ भवन निर्माताओं ने ट्रस्ट को चंदा दिया था। ईडी को आशंका है कि यह रकम कुछ शेल कंपनियों के जरिए जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण के लिए ट्रस्ट तक पहुंचाई गई।
क्या होती है शेल कंपनी?
शेल कंपनी ऐसी कंपनी होती है, जिसका कागजों पर तो पंजीकरण और बैंक खाता मौजूद होता है, लेकिन वास्तविक तौर पर उसका सक्रिय कारोबार, कार्यालय या कर्मचारी नहीं होते। ऐसी कंपनियों का इस्तेमाल कई बार वित्तीय लेनदेन को छिपाने या रकम को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए किया जाता है। हालांकि, किसी कंपनी का शेल कंपनी होना अपने आप में अवैध नहीं है; इसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया, यह जांच का विषय होता है।
मनी ट्रेल खंगाल रही ईडी
ईडी अब चंदे की रकम के पूरे मनी ट्रेल की जांच कर रही है। जांच एजेंसी यह पता लगाने में जुटी है कि किन कंपनियों और भवन निर्माताओं से रकम ट्रस्ट तक पहुंची और किन माध्यमों से उसका लेनदेन हुआ। सूत्रों के मुताबिक, जांच में सामने आए लेनदेन से जुड़े लोगों को पूछताछ के लिए समन भेजे जाने की तैयारी है।
वहीं, जौहर ट्रस्ट के कई पदाधिकारियों को भी रक्षाबंधन के बाद ईडी के समक्ष पेश होने के लिए नोटिस भेजे गए हैं। सूत्रों के अनुसार, बीते सप्ताह जौहर ट्रस्ट से जुड़े ठिकानों पर हुई ईडी की छापेमारी के दौरान जांच एजेंसी को कई वित्तीय लेनदेन से जुड़े सुराग मिले हैं।
अब ईडी इन सुरागों के आधार पर चंदे की रकम के स्रोत, शेल कंपनियों की भूमिका और जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण में इस्तेमाल हुई धनराशि की पूरी कड़ी जोड़ने में जुटी है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि इन लेनदेन में किसी तरह की वित्तीय अनियमितता या मनी लॉन्ड्रिंग का मामला बनता है या नहीं।
