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राज्यसभा में दल-बदल पर क्या कहते हैं कानून? AAP के 7 सांसद BJP में जाएं तो क्या जाएगी सदस्यता

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भारत की राजनीति में दल-बदल कोई नई बात नहीं है। आजादी के बाद से ही कई बार नेता और जनप्रतिनिधि पार्टी बदलते रहे हैं। लेकिन जब संसद के सदस्य, खासकर राज्यसभा सांसद, पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं, तो बड़ा सवाल उठता है—क्या उनकी सदस्यता खत्म हो जाती है या बची रहती है?

हाल के राजनीतिक घटनाक्रम में चर्चा है कि Raghav Chadha समेत आम आदमी पार्टी (AAP) के सात राज्यसभा सांसद भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो यह सिर्फ राजनीतिक घटनाक्रम नहीं होगा, बल्कि एक बड़ा संवैधानिक और कानूनी मामला भी बन सकता है।

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बताया जा रहा है कि Raghav Chadha ने आम आदमी पार्टी छोड़ दी है और कथित तौर पर छह अन्य सांसदों के साथ BJP का दामन थाम लिया है। इसे AAP के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि वे पार्टी के प्रमुख युवा चेहरों में गिने जाते रहे हैं।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर ये सांसद पार्टी बदलते हैं, तो क्या उनकी राज्यसभा सदस्यता बनी रहेगी?

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क्या है दल-बदल कानून?

भारत में दल-बदल रोकने के लिए 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई थी। इसे ही आमतौर पर Anti-Defection Law कहा जाता है।

इस कानून के तहत:

  • यदि कोई सांसद अपनी पार्टी छोड़ देता है
  • दूसरी पार्टी में शामिल हो जाता है
  • पार्टी व्हिप के खिलाफ वोट करता है
  • या बिना अनुमति वोटिंग से अनुपस्थित रहता है

तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है।

यानि सामान्य स्थिति में यदि AAP के सांसद BJP जॉइन करते हैं, तो उनकी सदस्यता खतरे में पड़ सकती है।

कब बच सकती है सदस्यता?

दसवीं अनुसूची में एक बड़ा अपवाद भी है—विलय (Merger)

यदि किसी दल के कम से कम दो-तिहाई सांसद सामूहिक रूप से किसी दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं, तो इसे दल-बदल नहीं माना जाता।

उदाहरण के तौर पर, यदि AAP के राज्यसभा में 10 सांसद हों और उनमें से 7 BJP में शामिल हो जाएं, तो यह दो-तिहाई संख्या के करीब होगा। ऐसी स्थिति में उनकी सदस्यता बच सकती है। लेकिन यदि संख्या दो-तिहाई से कम रही, तो दल-बदल कानून लागू हो सकता है।

राज्यसभा सांसदों पर फैसला कौन करेगा?

राज्यसभा के मामलों में अंतिम निर्णय सभापति (Chairman) लेते हैं, जो भारत के उपराष्ट्रपति होते हैं।

वे याचिका मिलने के बाद तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय देते हैं। हालांकि, उनका फैसला अंतिम नहीं होता, क्योंकि इसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है।

दल-बदल कानून पर सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले

1. Kihoto Hollohan vs Zachillhu, 1992

सुप्रीम कोर्ट ने दसवीं अनुसूची को वैध माना और कहा कि स्पीकर/चेयरमैन के फैसले की न्यायिक समीक्षा हो सकती है।

2. Ravi S. Naik vs Union of India, 1994

कोर्ट ने कहा कि केवल लिखित इस्तीफा जरूरी नहीं है। आचरण से भी माना जा सकता है कि सदस्य ने पार्टी छोड़ दी है।

3. Rajendra Singh Rana vs Swami Prasad Maurya, 2007

कोर्ट ने कहा कि स्पीकर को समय पर फैसला करना चाहिए। देरी न्याय के खिलाफ है।

4. Nabam Rebia case, 2016

यदि स्पीकर के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव लंबित हो, तो वे दल-बदल मामलों पर फैसला नहीं ले सकते।

5. Keisham Meghachandra Singh case, 2020

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अयोग्यता याचिकाओं पर सामान्यतः तीन महीने के भीतर फैसला होना चाहिए।

6. Subhash Desai vs Governor of Maharashtra, 2023

महाराष्ट्र के दल-बदल विवाद में कोर्ट ने राज्यपाल की सीमित भूमिका और स्पीकर की शक्तियों को स्पष्ट किया।

AAP सांसदों का भविष्य क्या होगा?

यदि AAP के सात राज्यसभा सांसद BJP में शामिल होते हैं, तो उनकी सदस्यता अपने आप खत्म नहीं होगी। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि:

  • कुल सांसदों की संख्या कितनी है
  • दो-तिहाई समर्थन है या नहीं
  • क्या इसे वैध विलय माना जाता है
  • सभापति क्या निर्णय देते हैं
  • मामला अदालत तक जाता है या नहीं

निष्कर्ष

AAP सांसदों का BJP में शामिल होना सिर्फ राजनीतिक घटनाक्रम नहीं, बल्कि संवैधानिक परीक्षा भी है। दल-बदल कानून साफ कहता है कि सदस्यता का फैसला परिस्थितियों, संख्या बल और प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

इसलिए हर मामला अपने तथ्यों के आधार पर तय होता है—और यही वजह है कि ऐसे विवाद राजनीति में संवेदनशील और कानून में जटिल माने जाते हैं।

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