एससी/एसटी एक्ट, यूजीसी नियमों और आरक्षण के मुद्दे पर दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी विरोध की चिंगारी अब उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक पहुंच चुकी है। दिल्ली में ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज द्वारा भरी गई हुंकार के बाद अब पूरे देश में माहौल गर्माता नजर आ रहा है। इसी कड़ी में लखनऊ में सवर्ण समाज का गुस्सा सड़कों पर उतर आया, जहाँ ‘सवर्ण मोर्चा’ के कार्यकर्ताओं ने सामान्य जाति के सांसदों और विधायकों का अनोखे और तीखे अंदाज में विरोध किया। प्रदर्शनकारियों ने सामान्य जाति के नेताओं की सांकेतिक अर्थी (शव यात्रा) निकाली और “मुर्दा है भाई मुर्दा है, नेता हमारा मुर्दा है!” जैसे नारों से पूरी राजधानी को गुंजा दिया। सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री तक अपनी बात पहुंचाते हुए साफ चेतावनी दी।
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प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे सवर्ण मोर्चा के अध्यक्ष संदीप सिंह ने दोटूक शब्दों में कहा कि सत्ता में बैठे सामान्य जाति के जनप्रतिनिधियों से अब लगातार जवाब मांगा जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूजीसी और आरक्षण से जुड़े विवादित कानूनों का विरोध जारी रहेगा और समाज इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगा। संदीप सिंह ने सीधे तौर पर चेतावनी दी कि अगर सरकार ने उनकी मांगों पर जल्द ध्यान नहीं दिया, तो सवर्ण समाज चुनाव में अपनी संगठित ताकत दिखाकर जवाब देगा। इस विरोध प्रदर्शन के दौरान सवर्ण समाज का गुस्सा उन चेहरों पर भी बुरी तरह फूटा जो हाल ही में सरकार के साथ खड़े नजर आए थे। बीते दिनों डिप्टी सीएम बृजेश पाठक के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले हर्ष दुबे कार्यकर्ताओं के निशाने पर रहे। प्रदर्शनकारियों ने आक्रोश जताते हुए कहा कि हर्ष दुबे पैसों के लालच में आकर बिक गए हैं और सवर्ण समाज की न्याय यात्रा को नीलाम करने निकल पड़े हैं। इसी के साथ डिप्टी सीएम बृजेश पाठक पर भी जमकर हमला बोला गया और आरोप लगाया गया कि सवर्ण समाज से आने के बावजूद वे समाज के हितों पर चुप बैठे हैं।लखनऊ में हुई इस राजनीतिक हलचल ने सत्ता के गलियारों में खलबली मचा दी है, क्योंकि उत्तर प्रदेश की लगभग 150 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज का सीधा दबदबा माना जाता है। पारंपरिक रूप से यह वर्ग भारतीय जनता पार्टी की जीत में अहम भूमिका निभाता आया है। ऐसे में अगर जंतर-मंतर से शुरू हुई यह आग अन्य राज्यों तक फैलती है और सवर्ण समाज की नाराजगी यूं ही बनी रहती है, तो आने वाले चुनावों में बीजेपी के लिए सियासी गणित बिगड़ सकता है। अब देखना यह होगा कि सरकार सवर्ण समाज के इस उबलते असंतोष को शांत करने के लिए क्या कदम उठाती है।