जहां एक तरफ देश में अंतरराष्ट्रीय हालात और ईरान युद्ध को लेकर पेट्रोल-डीजल की संभावित किल्लत की चर्चाएं हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ नेताओं के काफिले कम होने का नाम नहीं ले रहे। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार सादगी, संसाधनों की बचत और अनावश्यक खर्च कम करने का संदेश देते दिखाई देते हैं। चर्चा यह भी है कि सुरक्षा व्यवस्था में भी कटौती की गई है, ताकि ईंधन की खपत कम हो और जनता को भी एक संदेश जाए कि संकट के समय संयम जरूरी है।
प्रधानमंत्री की ओर से आम लोगों से पेट्रोल और डीजल कम खर्च करने की अपील की जा रही है। जनता से कहा जा रहा है कि जहां संभव हो वहां अनावश्यक यात्रा से बचें, संसाधनों का संतुलित उपयोग करें और देशहित में सहयोग दें। लेकिन लगता है कुछ नेताओं तक यह संदेश पहुंचते-पहुंचते रास्ता भटक गया। मेरठ में भाजपा जिला अध्यक्ष गौरव चौधरी ने सैकड़ों ट्रैक्टरों और गाड़ियों के साथ ऐसा विशाल काफिला निकाला कि देखने वालों को लगा मानो ईंधन बचाने नहीं, बल्कि खत्म करने की प्रतियोगिता चल रही हो। लंबी-लंबी गाड़ियों की लाइन, ट्रैक्टरों का शोर और शक्ति प्रदर्शन ऐसा कि प्रधानमंत्री की अपील कहीं पीछे छूटती नजर आई।
अब सवाल यह उठ रहा है कि पेट्रोल-डीजल बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ आम जनता की है या नेताओं की भी कुछ भूमिका तय होगी? क्योंकि जब जनता से त्याग और बचत की उम्मीद की जाती है, तब नेताओं के ऐसे शक्ति प्रदर्शन कई सवाल खड़े कर देते हैं। जनता भी अब तंज कस रही है कि शायद “ईंधन बचाओ अभियान” सिर्फ आम आदमी के लिए है, जबकि नेताओं के काफिलों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता।





